लेखक · 1 रचनाएँ
जॉन रोनाल्ड रूएल टोल्किन का जन्म 3 जनवरी 1892 को दक्षिण अफ़्रीका के ब्लूमफ़ोन्टेन में हुआ। 1895 में जब माँ अपने दोनों बेटों को लेकर इंग्लैंड लौट आईं, तो वहीं रह गए बैंक प्रबंधक पिता आर्थर की अगले ही बरस मृत्यु हो गई। बचपन बर्मिंघम के पास के गाँवों में बीता। माँ मेबल ने 1900 में कैथोलिक धर्म अपनाया; 1904 में मधुमेह से उनकी मृत्यु के बाद दोनों भाइयों की संरक्षकता फ़ादर फ़्रांसिस मॉर्गन को मिली। स्कूल के वर्षों में पुरानी भाषाएँ और ख़ुद गढ़ी हुई लिपियाँ ही उनका असली काम बन गईं।
ऑक्सफ़र्ड के एक्सेटर कॉलेज में उन्होंने शास्त्रीय भाषाविज्ञान छोड़कर अंग्रेज़ी भाषा ली और 1915 में प्रथम श्रेणी से स्नातक हुए। 1916 में एडिथ ब्रैट से विवाह किया और उसी वर्ष अफ़सर बनकर सोम के मोर्चे पर भेजे गए। खाइयों में लगे बुख़ार ने उन्हें इंग्लैंड लौटा दिया; स्वास्थ्यलाभ के उन महीनों में उन्होंने ‘द बुक ऑफ़ लॉस्ट टेल्स’ लिखनी शुरू की, जो आगे चलकर ‘द सिल्मारिलियन’ बनी।
युद्ध के बाद उन्होंने ऑक्सफ़र्ड इंग्लिश डिक्शनरी में काम किया, लीड्स में पढ़ाया और 1925 में एंग्लो-सैक्सन के प्राध्यापक बनकर ऑक्सफ़र्ड लौटे। 1936 में ‘बेओवुल्फ़’ पर दिया गया उनका व्याख्यान इस महाकाव्य को साहित्य की तरह पढ़ने का रास्ता खोल गया। बच्चों को सुनाई कहानी से जन्मा ‘द हॉबिट’ 1937 में छपा; अगली कड़ी की माँग हुई तो दस बरस से लंबा श्रम शुरू हुआ, और ‘द लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स’ 1954-1955 में तीन खंडों में प्रकाशित हुआ।
टोल्किन ने पहले भाषाएँ बनाईं, फिर उन्हें बोलने वाली जातियाँ; जिस संसार की वे बात करते थे उसका अपना नक़्शा, अपना पंचांग और अपनी कविता थी। महाकाव्य की भाषा पर टिकी उनकी गंभीर शैली ने समीक्षकों को लंबे समय तक दूर रखा, पर पाठक किताब को हाथोंहाथ बाँटते रहे। एडिथ का 1971 में देहांत हुआ; टोल्किन 2 सितंबर 1973 को बोर्नमथ में चल बसे और ऑक्सफ़र्ड में पत्नी के पास दफ़नाए गए। अधूरी रह गई ‘द सिल्मारिलियन’ को बेटे क्रिस्टोफ़र ने संजोकर 1977 में छपवाया।
टोल्किन ने दो विश्वयुद्धों की छाया में, उन बरसों में लिखा जब साहित्य पर आधुनिकतावाद का राज था। जॉयस और वुल्फ़ के रूप-प्रयोग, टूटी हुई चेतना और शहर की घुटन जब कसौटी माने जाते थे, तब वे उस ग्रामीण इंग्लैंड की ओर मुड़े जिसे उद्योग मिटा रहा था, और मध्यकालीन महाकाव्य परंपरा की ओर। 1950 के दशक में ‘द लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स’ आया तो समीक्षकों ने उसे पलायन का साहित्य कहकर ख़ारिज कर दिया; फ़ैंटेसी को गंभीरता से लिया जाए या नहीं, यह बहस वर्षों चली। अधिनायकवाद और सर्वग्रासी युद्ध की सदी में वे अपनी किताब को रूपक की तरह पढ़े जाने का हमेशा विरोध करते रहे।