
Fyodor Dostoyevski
द ब्रदर्स कारामाज़ोव, फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की द्वारा लिखित एक दार्शनिक उत्कृष्ट कृति है, जिसकी पृष्ठभूमि 19वीं सदी का रूस है। यह रचना फ्योदोर कारामाज़ोव, जो एक अनैतिक ज़मींदार है, और उसके चार बेटों (मित्या, इवान, अल्योशा और स्मर्दयाकोव) के बीच के तनाव के इर्द-गिर्द घूमती है। इन सभी के विश्वदृष्टिकोण और मनोवैज्ञानिक बनावट बहुत अलग हैं। कहानी पिता की हत्या के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
कारामाज़ोव परिवार में संपत्ति और एक ही स्त्री (ग्रुशेंका) के प्रति वासना के कारण पिता (फ्योदोर) और पुत्र (दिमित्री) के बीच गहराता संभावित हत्या और विनाश का टकराव। इस धुरी पर आस्था और अनास्था, अभिमान और विनम्रता का द्वंद्व प्रकट होता है।
रूस का एक छोटा प्रांतीय कस्बा; घटनाएं मठ (कोठरियों, आश्रम), फ्योदोर पाव्लीविच के घर, और कैटरीना इवानोव्ना व खोख्लाकोवा के बैठक कक्षों में घटित होती हैं।
19वीं सदी का उत्तरार्ध; वह दौर जब रूस में कृषि दास प्रथा समाप्त कर दी गई थी और नए न्यायालयों (सामाजिक व कानूनी सुधारों) तथा उदारवादी विचारों की चर्चा हो रही थी।
एक गंभीर, तनावपूर्ण, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक खिंचाव का माहौल, जहाँ धार्मिक व सांसारिक वासनाओं तथा उच्च नैतिक मूल्यों व पाशविक प्रवृत्तियों के बीच निरंतर और तीव्र संघर्ष चलता रहता है।
सर्वज्ञ लेखक की उत्तम पुरुष (बहुवचन/एकवचन) में की गई कथा, जो समय-समय पर घटनाओं को स्वयं देखने वाले एक नगरवासी की तरह 'हमारा शहर', 'हम' जैसे शब्दों का प्रयोग करता है और निष्पक्ष दिखने का प्रयास करते हुए भी पात्रों की गहनतम मानसिक दशाओं तथा दार्शनिक अंतर्विरोधों का विश्लेषण करता है।
समाज में प्रतिष्ठा धन और पद से मापी जाती है, जबकि मानवीय आत्मा के नियम वासना, गर्व और विश्वास द्वारा तय होते हैं। रूढ़िवादी मठ परंपरा (स्तारेत्स व्यवस्था) पूर्ण आज्ञाकारिता और प्रेम की मांग करती है, जबकि बाहरी दुनिया (पिता का घर, मयखाने) लालच, धूर्तता और अनियंत्रित वासनाओं से संचालित होती है। अधिकांश लोगों में उच्च विचारशील दिखने और नीचतापूर्ण आचरण करने की प्रवृत्ति आपस में गुंथी हुई है।
धार्मिक रूसी जनसाधारण, जो अगाध विश्वास के साथ स्तारेत्स (संतों) से चमत्कारों की आशा करता है और घोर दरिद्रता व कष्टों में जीवन बिता रहा है। अभिजात वर्ग और पादरियों के बीच एक मौन तनाव है; पश्चिमी विचारों से प्रभावित उदारवादी और समाजवादी धारणाएँ पारंपरिक रूढ़िवादी (ऑर्थोडॉक्स) मूल्यों से टकरा रही हैं।
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धन और संपत्ति के बँटवारे से शुरू हुआ विवाद, दोनों की एक ही स्त्री (ग्रुशेंका) के प्रति अंध वासना के कारण हत्या की सीमा तक पहुँचने वाली प्रतिद्वंद्विता में बदल गया है। पिता अपने बेटे से डरता है, फिर भी चालाकी से उसे भड़काने और नीचा दिखाने के अवसर ढूँढ़ता रहता है। पुत्र अपने पिता की निर्लज्जता से घृणा करता है और हर क्षण उस पर हिंसा करने को उतारू रहता है।
स्तारेत्स के कक्ष में जब उनका विवाद होता है, तो दिमित्री खुले तौर पर चिल्लाकर आरोप लगाता है कि उसके पिता ने उसे बर्बाद करने के लिए ऋणपत्र ग्रुशेंका को सौंप दिए हैं, और वह पितृहंता बनने की धमकी देता है।
फ्योदोर जानता है कि इवान उससे घृणा करता है और मन ही मन उसे तुच्छ समझता है; वह दिमित्री से भी अधिक इवान से भयभीत रहता है। दूसरी ओर इवान अपने पिता को एक घिनौना 'सरीसृप' और 'सूअर' मानता है; यद्यपि वह उसके सामने औपचारिक शिष्टाचार बनाए रखता है, पर भीतर से उसकी मृत्यु की कामना करता है।
फ्योदोर, इवान के साथ शराब पीते हुए अलोशा से स्पष्ट कहता है, 'इवान हमसे प्रेम नहीं करता, मुझे उस पर भरोसा नहीं है', जबकि इवान अपने पिता की पिटाई के प्रति उदासीन रहकर यह कहकर अपनी घृणा प्रकट करता है कि 'एक सरीसृप दूसरे को खा ही जाता'।
अलोशा अपने भ्रष्ट पिता को बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रेम करता है, जिससे पिता के मन में उसके प्रति एक विस्मयकारी श्रद्धा उत्पन्न होती है। फ्योदोर जानता है कि पूरे संसार में केवल अलोशा ही उसे हीन दृष्टि से नहीं देखता, इसलिए वह उसके प्रति एक दुर्लभ, भावविभोर कर देने वाली निष्कपट करुणा और स्नेह का अनुभव करता है।
फ्योदोर सेवकों के सामने अलोशा से कहता है, 'तुम मेरी आँखों में देखकर जिस तरह मुझसे प्रेम करते हो, उससे मेरा दिल पिघल जाता है; क्या मैं कभी तुम्हारा दिल दुखा सकता हूँ?'
दिमित्री, कतेरीना के कुलीन बड़प्पन और उसके उपकारों के बोझ तले दबा हुआ महसूस करता है और अपनी वासना-लोलुपता के कारण उसके सामने स्वयं को एक तुच्छ कीड़े जैसा समझता है। वहीं कतेरीना, दिमित्री के विश्वासघातों को सहते हुए उसे नियति की तरह 'उबारने' के कर्तव्य को अपने स्वाभिमान का प्रश्न बना चुकी है।
दिमित्री, अलोशा को बताता है कि कैसे कतेरीना के ज़मीन पर माथा टेककर प्रणाम करने ने उसे भयभीत कर दिया था, जबकि कतेरीना 'अपने सम्मान की खातिर' जीवन भर निष्ठापूर्वक उसका साथ न छोड़ने की घोषणा करती है।
यह एक अनियंत्रित पाशविक वासना का बंधन है, जिसके लिए दिमित्री ने अपना सब कुछ (सम्मान, धन, मंगेतर) दांव पर लगा दिया है। ग्रुशेंका इस प्रेम का उपहास उड़ाती है और अपनी मनमर्जी से उसे अपना दास बनाए रखती है, किंतु दिमित्री को इस पीड़ा में भी एक आत्मघाती सुख मिलता है।
दिमित्री कहता है कि ग्रुशेंका की खातिर चुराए गए धन को उड़ाते हुए वह मोक्रोए गया था और अब वह उसके एक इशारे पर अपने पिता तक की हत्या करने को तैयार है।
इवान, कैटरीना से बेहद शिद्दत से प्यार करता है, लेकिन कैटरीना अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए उसे 'सलाहकार और मित्र' बनाकर अपने पास रखती है और उसे तड़पाती है। इवान यह समझ जाता है कि इस औरत का असली सुख केवल दुख झेलने और झूठे आत्म-बलिदान में है, और वह यह बात उसके मुंह पर कहकर उसे छोड़कर जाने की बात कहता है।
इवान कमरे से गुस्से में बाहर निकलते हुए कैटरीना से कहता है, 'आपने प्रतिशोध की अपनी चाहत के कारण मुझसे कभी प्यार नहीं किया, आप केवल दिमित्री द्वारा किए गए उन अनमने अपमानों से ही प्यार करती हैं।'
ज़ोसिमा, अलोशा को इस धरती पर एक देवदूत की तरह प्यार करते हैं और उसे उसके सांसारिक कर्तव्यों के लिए मठ छोड़ने के लिए तैयार करते हैं। वहीं अलोशा, ज़ोसिमा को ईश्वर के निकट ऐसा संत मानता है जो चमत्कार कर सकते हैं, और वह उनके प्रति बालसुलभ, अडिग श्रद्धा और अटूट विश्वास रखता है।
अलोशा, ज़ोसिमा को दिमित्री के आगे घुटने टेकते देखकर स्तब्ध रह जाता है और जब भी वह अपने स्तारेत्स की निकट मृत्यु के बारे में सोचता है, उसका दिल दहल उठता है और वह रोना चाहता है।
लीज़ा बिस्तर पर पड़ी एक बीमार युवती है; उसे अलोशा का मज़ाक उड़ाने और उसे परेशान करने में मज़ा आता है, मगर भीतर ही भीतर वह उससे गहरा प्रेम करती है। अलोशा इस प्रेम को शांत भाव और पवित्रता के साथ, गंभीरता से स्वीकार करता है बिना किसी असहजता के।
लीज़ा अपने पत्र में यह इकरार करती है कि वह अलोशा को बचपन से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है, जबकि अलोशा यह पत्र पाकर मुस्कुराता है और प्रार्थना करता है।
शुरुआत में कैटरीना, ग्रुशेंका के हाथ चूमने की हद तक आभार और स्नेह दिखाकर उसे अपने वश में करने की कोशिश करती है। लेकिन ग्रुशेंका उसे झांसे में लेकर जानबूझकर उसका हाथ चूमने से इनकार कर देती है, जिससे कैटरीना का असली अहंकार सामने आ जाता है और दोनों के बीच पल भर में भीषण नफरत भड़क उठती है।
कैटरीना की बढ़ा-चढ़ाकर की गई तारीफों के बाद जब ग्रुशेंका कहती है, 'मैंने कोई वादा नहीं किया था, मैं यह हाथ नहीं चूमूंगी,' तो कैटरीना चीख पड़ती है, 'कुतिया! दफा हो जा यहां से!'
मियूसीव, पेरिस से लौटा एक घमंडी कुलीन व्यक्ति है जो फ्योदोर के विदूषक जैसे व्यवहार से नफरत करता है। वहीं फ्योदोर, मियूसीव के इस दिखावटी बड़प्पन को चूर करने और उसे लज्जित करने के लिए जानबूझकर बेशर्मी करता है और उसे आपे से बाहर कर देता है।
जब फ्योदोर मठ की कोठरी में मियूसीव को चिढ़ाने के लिए मनगढ़ंत कहानियां और झूठ बोलने लगता है, तो मियूसीव अपना आपा खो बैठता है और चिल्लाने लगता है।
स्मेर्द्याकोव, इवान के नास्तिकतावादी और अस्ति-शून्यवादी (निहिलिस्ट) विचारों का मुरीद है और उसके साथ एक विचित्र मूक समझौते में बंधा हुआ है। इवान भले ही उसे तुच्छ समझता हो, लेकिन नौकर द्वारा धार्मिक नियमों का बेबाकी से उपहास उड़ाए जाने का वह आनंद लेता है।
स्मेर्द्याकोव जब मेज़ पर यह तर्क दे रहा होता है कि धर्म का परित्याग करना कोई पाप नहीं है, तब वह इवान की आंखों में देखते हुए परोक्ष रूप से उसकी सहमति तलाशता है।
राकीतिन, दिखावे के तौर पर अलोशा का दोस्त बनने वाला एक अवसरवादी और द्वेषी सेमिनरी छात्र है। वह अलोशा के भोलेपन और कारामाज़ोव वंश का उपहास उड़ाता है। वहीं अलोशा, उसके भीतर की दुर्भावना को भांपकर दुखी होते हुए भी उसे दोष न देने का प्रयास करता है।
राकीतिन यह कहते हुए कि कारामाज़ोव परिवार में वासना और हत्या का संकट निकट है, द्वेषपूर्ण आवेश के साथ दावा करता है कि इवान कैटरीना से शादी करके अमीर बन जाएगा।