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उनका जन्म 1844 में इस्तांबुल के तोपहाने मुहल्ले में हुआ। पिता सुलेयमान आग़ा कपड़े का कारोबार करते थे; माँ नेफ़ीसे हानिम काकेशस से आई थीं। पिता को बचपन में ही खो देने के कारण वे स्कूल नहीं, दुकान पहुँचे और मिस्र बाज़ार के एक जड़ी-बूटी विक्रेता के यहाँ शागिर्दी की। बड़े भाई की तैनाती उन्हें पहले विदिन और फिर निश ले गई, जहाँ उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी की।
दानूब प्रांत के दफ़्तर में मुंशी बने तो मिधात पाशा की नज़र में आ गए, और पाशा ने अपना ही नाम उन्हें दे दिया। रूसे में उन्होंने ‘तूना’ अख़बार के लिए लिखना शुरू किया और जल्द ही उसके प्रधान संपादक बन गए। 1869 में वे पाशा के साथ बग़दाद गए और वहाँ ‘ज़ेवरा’ अख़बार चलाया। 1871 में इस्तांबुल लौटकर उन्होंने अपना छापाखाना खोला और ‘दाअरजिक’ तथा ‘क़िरकंबार’ पत्रिकाएँ निकालीं।
‘दाअरजिक’ में छपे एक लेख पर उन पर धर्मविरोध का आरोप लगा और 1873 में उन्हें रोड्स निर्वासित कर दिया गया, जहाँ भी वे पढ़ाते रहे। 1876 में वे इस्तांबुल लौटे। उपन्यासकार के रूप में उनकी शुरुआत 1874 में ‘हसन मेल्लाह’ से हुई और अगले ही वर्ष ‘फ़ेलातुन बे और राकिम एफ़ेंदी’ में उन्हें अपनी पहचान मिली। 1878 में शुरू किया गया उनका अख़बार ‘तेरजुमान-ए हकीकत’ उस्मानी पत्रकारिता के सबसे लंबे चलने वाले अख़बारों में गिना गया; फ़ातमा आलिये को साहित्य में लाने वाले भी वही थे।
वे सादा भाषा में लिखते थे, मानो पाठक का हाथ थामकर चल रहे हों, और कथा रोककर समझाने में उन्हें झिझक नहीं होती थी। ढाई सौ से अधिक पुस्तकों के कारण उन्हें “लिखने की मशीन” कहा गया और जनता का पहला शिक्षक माना गया। उन्होंने उपन्यास को तुर्की के व्यापक पाठक तक पहुँचाया। 1889 में उन्होंने स्टॉकहोम के प्राच्यविद् सम्मेलन में भाग लिया। अंतिम वर्षों में वे दारुलफ़ुनून में पढ़ाते रहे और 28 दिसंबर 1912 को दारुश्शफ़ाका में, जहाँ वे नि:शुल्क पढ़ाते थे, उनका देहांत हुआ।
उन्होंने तंज़ीमात की दूसरी पीढ़ी में, उस दौर में लिखा जब उस्मानी साम्राज्य पश्चिम से अपने रिश्ते पर फिर से सोच रहा था। अख़बार एक नई ताक़त था और उपन्यास तुर्की भाषा में अभी-अभी दाख़िल हो रहा था। नामिक केमाल के इर्द-गिर्द जमा ‘यंग ओटोमन’ राजनीतिक स्वतंत्रता माँग रहे थे, जबकि उन्होंने पहले जनता को शिक्षित करना चुना। पश्चिमीकरण कहीं नक़ल में न बदल जाए — इस बहस के ठीक बीच वे खड़े थे; ‘फ़ेलातुन बे और राकिम एफ़ेंदी’ इसी बहस का उपन्यास है। अब्दुलहमीद द्वितीय की कड़ी सेंसरशिप में उन्होंने राजनीति से दूर प्रकाशन को चुना।