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उनका जन्म 24 नवम्बर 1632 को आम्स्टर्डम में हुआ। उनका परिवार उन पुर्तगाली यहूदियों में से था जो धर्माधिकरण से बचकर नीदरलैंड आ बसे थे; पिता मिकाएल व्यापारी थे। माँ हन्ना देबोरा का देहान्त तब हुआ जब वे छह वर्ष के भी नहीं थे। समुदाय की तालमूद तोरा पाठशाला में उन्होंने हिब्रू और धर्मग्रंथ पढ़े, और किशोरावस्था में पिता के कारोबार में काम किया।
1654 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने व्यापार छोड़ दिया; भूतपूर्व जेसुइट फ्रांसिस्कुस फान डेन एन्डेन की लातीनी पाठशाला में जाकर उन्होंने देकार्त, नए प्राकृतिक विज्ञान और आम्स्टर्डम के असहमत हलकों को जाना। उनके विचारों ने समुदाय को बेचैन कर दिया: 27 जुलाई 1656 को, जब वे मात्र तेईस वर्ष के थे, आम्स्टर्डम के पुर्तगाली समुदाय ने अपने अब तक के सबसे कठोर बहिष्कार से उन्हें निकाल बाहर किया। उन्होंने अपना नाम बेनेदिक्तुस रख लिया; 1663 में छपी 'देकार्त के दर्शन के सिद्धांत' उनके जीवनकाल में उनके अपने नाम से निकली अकेली पुस्तक रही।
वे लाइडन के पास राइन्सबुर्ख में, फिर फोरबुर्ख में और अन्ततः हेग में बसे। जीविका वे सूक्ष्मदर्शी और दूरबीन के लेंस घिसकर चलाते थे, और इसी काम को लेकर अपने समय के प्रकाशविदों से — जिनमें क्रिस्टियान हॉयगेंस भी थे — पत्र-व्यवहार करते रहे। 1670 में उन्होंने अपना नाम छिपाकर 'धर्मशास्त्रीय-राजनीतिक ग्रंथ' छपवाया; 1674 में उस पर रोक लगा दी गई। 1673 में हाइडलबर्ग से आया अध्यापन का निमंत्रण उन्होंने यह कहकर लौटा दिया कि वह उनकी विचार-स्वतंत्रता को बाँध देगा।
'एथिका' को उन्होंने परिभाषाओं, स्वयंसिद्धियों और प्रमेयों से, ज्यामिति की पुस्तक के क्रम में खड़ा किया, और भावनाओं को नैतिक भर्त्सना से नहीं, प्रकृति की घटनाओं जैसी शान्ति से देखा। जीते-जी उसे छापने का साहस वे न कर सके। 21 फरवरी 1677 को हेग में, चौवालीस वर्ष की आयु में, फेफड़ों के उस रोग से उनकी मृत्यु हुई जिसे वर्षों तक साँस में गया काँच का चूर्ण बिगाड़ चुका था। मित्रों ने उसी वर्ष चुपचाप उनकी पांडुलिपियाँ छाप दीं; उनकी किताबें पाठकों तक उनके जाने के बाद ही पहुँचीं।
वे उन वर्षों में लिख रहे थे जब डच गणराज्य व्यापार से समृद्ध हो रहा था और यूरोप का सबसे सहिष्णु देश माना जाता था, जबकि कैल्विनवादी उपदेशक उस सहिष्णुता की सीमाएँ लगातार सँकरी करते जा रहे थे। देकार्त के बुद्धिवाद ने विश्वविद्यालयों को बाँट दिया था और आम्स्टर्डम का पुर्तगाली यहूदी समुदाय अपनी हदें सँभाल रहा था। दे विट भाइयों के गणतंत्रवादी शासन और ऑरेंजवादियों की खींचतान 1672 में खून से खत्म हुई। इसी माहौल में स्पिनोज़ा ने धर्मग्रंथ को ऐतिहासिक पाठ की तरह पढ़ने और विचार की स्वतंत्रता की वकालत की।