
Baruch Spinoza
बारुच स्पिनोज़ा की उत्कृष्ट कृति 'एतिका', जो 1677 में प्रकाशित हुई, एक सर्वेश्वरवादी (pantheistic) रचना है। इसमें ज्यामितीय पद्धति (स्वयंसिद्धों और प्रमेयों) का उपयोग करते हुए ईश्वर, मन, भावनाओं और नैतिकता की समीक्षा की गई है। इस कार्य का प्राथमिक उद्देश्य मनुष्य को क्षणभंगुर वासनाओं के बंधन से मुक्त करना और उसे तर्क के माध्यम से परम सुख और स्वतंत्रता की ओर ले जाना है।
मनुष्य के अपने अंध आवेगों, प्रकृति के अतार्किक बाह्य प्रभावों और अंधविश्वासों के बंदी होने की 'दासता' वाली स्थिति तथा इन भ्रमों को तर्कसंगत बुद्धि से सुलझाकर ईश्वर/प्रकृति के ज्ञान को समझकर आंतरिक शांति प्राप्त करने की 'स्वतंत्रता' एवं 'आनंद' की अवस्था के बीच का अंतहीन आंतरिक-ब्रह्मांडीय संघर्ष।
मानव आत्मा की भूलभुलैया, भावनाओं के संचलन और अस्तित्व की सत्तामूलक परतों पर उभरता हुआ एक बहुआयामी, पूर्णतः मानसिक (सैद्धांतिक) दार्शनिक परिदृश्य।
17वीं शताब्दी (रचना के लिखे जाने का ऐतिहासिक संदर्भ, किंतु वैचारिक धरातल 'Sub specie aeternitatis' अर्थात् अनादिता, कालातीतता और अनंतता के आयाम में है)।
तर्कसंगत, नियतिवादी, पूर्णतः तार्किक और ज्यामितीय परिशुद्धता से युक्त, बुद्धि के प्रकाश से आलोकित, विचारमग्न और गंभीर दार्शनिक ब्रह्मांड।
पाठक को चरण-दर-चरण अकाट्य सत्यों की ओर ले जाने वाली, उपदेशात्मक, आधिकारिक, शांत, निगमनात्मक ज्यामितीय तर्क-पद्धति (मोरे ज्योमेट्रिको) का उपयोग करने वाली विश्लेषणात्मक प्रथम पुरुष बाह्य एवं आंतरिक कथावाचक की आवाज़।
ब्रह्मांड में ईश्वर या प्रकृति के शाश्वत और अनिवार्य नियमों के अतिरिक्त कोई अन्य क्रिया-रूप अस्तित्व में नहीं हो सकता। मनुष्य, अन्य प्राणियों की भाँति, कार्य-कारण की निरपेक्ष श्रृंखला से दृढ़तापूर्वक बंधा हुआ है और 'स्वतंत्र इच्छा' एक भ्रम है। मन और शरीर, एक ही द्रव्य (ईश्वर) की 'विचार' और 'विस्तार' नामक दो भिन्न विशेषताओं के माध्यम से समानांतर और समकालिक रूप से कार्य करने वाली संरचना हैं। कोई बाह्य उद्देश्य या प्रयोजन नहीं है; सब कुछ केवल कार्य-कारण के जाल में अपनी प्रकृति की अनिवार्यता के साथ घटित होता है।
वह प्रारंभिक प्रबोधन काल जो 17वीं सदी के हॉलैंड में विकसित हुआ, जहाँ मध्यकालीन रूढ़िवादी दर्शन के जड़ प्रभावों को तोड़ा जा रहा था, पुनर्जागरण के बाद के कार्तीय दर्शन पर बहस हो रही थी और धार्मिक कट्टरता बुद्धि के साथ टकरा रही थी।
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स्पिनोज़ा, परम द्रव्य को समझने को अपने जीवन का केंद्र बनाते हैं। वे निष्क्रिय भावों से पूरी तरह मुक्त होकर, गहन विस्मय और ज्ञान के साथ प्रकृति के तर्कसंगत नियमों का अध्ययन करते हैं।
आत्मा का सर्वोच्च प्रयास, उसका सर्वोच्च सद्गुण, वस्तुओं को ज्ञान के तीसरे प्रकार से (ईश्वर को) जानना है।
स्पिनोज़ा, देकार्त की प्रतिभा की आंशिक सराहना करते हुए भी, उनके मन-शरीर विभाजन और इच्छाशक्ति की निरपेक्षता के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हैं और उसके विरोध में अपने सिद्धांत का निर्माण करते हैं।
वे यह कहते हुए देकार्त की तीखी आलोचना करते हैं कि मानव मन और शरीर के मिलन के संबंध में देकार्त द्वारा दिए गए उदाहरणों पर आश्चर्यचकित हुए बिना मैं नहीं रह सकता।
स्पिनोज़ा अज्ञानी मनुष्य की दुखद दासता पर दया करने या उसका उपहास उड़ाने के बजाय उसे एक इंजीनियर की निष्पक्षता व शांत चित्त से समझने का प्रयास करते हैं और एक कठोर किंतु हितकारी चिकित्सक की भाँति उसे मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
वे यह कहकर उन्हें सही राह दिखाते हैं कि मैं उन लोगों के विषय की ओर लौटना चाहता हूँ जो मनुष्यों को समझने के बजाय उनके भावों और प्रभावों से घृणा किए बिना उनका उपहास उड़ाना पसंद करते हैं।
जहाँ स्वतंत्र मनुष्य पूर्ण तर्कसंगत नियंत्रण प्रदर्शित करते हुए शांत जीवन जीता है, वहीं दास/अज्ञानी मनुष्य हवा में उड़ते सूखे पत्ते की तरह भय और अंधविश्वासों के अनियंत्रित आधिपत्य तले निरंतर तड़पता रहता है।
अज्ञानी, कई दृष्टियों से बाह्य कारणों द्वारा भटकाए जाने के कारण... किसी भी रूप में आंतरिक संतोष प्राप्त नहीं कर पाते।
दास मनुष्य ईश्वर को प्रकृति से अलग, क्रोधित होने वाला या पुरस्कार देने वाला एक आकाशीय तानाशाह समझता है; इसलिए ईश्वर/प्रकृति का संबंध केवल भय और आज्ञाकारिता के एक भ्रम में बदल जाता है।
लोग अपने जैसे स्वरूप वाले और इच्छाओं से युक्त ईश्वर की कल्पना करते हैं और उससे केवल अपने स्वार्थ या दंड के भय के कारण ही प्रेम करते हैं।
स्वतंत्र मनुष्य ईश्वर/प्रकृति को उसकी समग्रता में अनुभव करता है। प्रकृति के नियमों से लड़ने के बजाय उन्हें अंगीकार करके वह एक भयरहित बौद्धिक सद्गुण और सहज स्वीकृति के धरातल पर उठ जाता है।
जिस हद तक हम ईश्वर को हर वस्तु के कारण के रूप में जानते हैं, उसी हद तक हम आनंदित होते हैं।
विवेक के अनुसार जीने वाले मनुष्य, क्योंकि उनके हित आपस में नहीं टकराते और वे केवल सार्वभौमिक सत्य की खोज करते हैं, परस्पर पूर्ण एकजुटता और लाभ प्रदान करने की क्षमता रखते हैं।
मनुष्य केवल विवेक के सिद्धांतों के अनुसार जीने के कारण ही स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के साथ अनिवार्य सामंजस्य में रहते हैं।
देकार्त ने दावा किया कि मन पीनियल ग्रंथि के माध्यम से शरीर को स्वतंत्र रूप से आकार दे सकता है, और इस प्रकार उसने प्रकृति के कार्यकारण जाल में मन की स्थिति को पूरी तरह से गलत आधार पर स्थापित कर दिया।
स्पिनोज़ा मन के मस्तिष्क की किसी ग्रंथि में स्थित होने के उसके प्रमाण के लिए यह आलोचना प्रस्तुत करते हैं कि 'यह एक दार्शनिक द्वारा अज्ञात वस्तुओं को रहस्यमयी गुणों से स्पष्ट करने मात्र के समान है'।
भावों के दास बने मनुष्य, विवेक की साझा ज़मीन खो देने के कारण अपनी अहंकारी इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं, जो उन्हें भीषण प्रतिस्पर्धा, संघर्ष और घृणा के धरातल पर धकेल देता है।
मनुष्य, निष्क्रिय भावों (आवेगों) के अधीन होने के कारण स्वभावतः एक-दूसरे के विरोधी हो सकते हैं।
स्पिनोज़ा द्वारा प्राप्त मानसिक स्पष्टता, उनके द्वारा पाठ में कल्पित 'मुक्त मनुष्य' के आदर्श की नींव तैयार करती है। दार्शनिक वास्तव में उस आदर्श के शिक्षक और साक्षात प्रतिबिंब हैं, जिसका वर्णन वे पाठ में करते हैं और जिसे वे चाहते हैं कि हर कोई प्राप्त करे।
दार्शनिक कहते हैं: मैं इस भाग (मानव स्वतंत्रता) में यह दिखाकर विवेक की शक्ति की परीक्षा करूँगा कि वह संवेगों के विरुद्ध क्या कर सकता है।