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इवान अलेक्सांद्रोविच गोंचारोव का जन्म 1812 में वोल्गा के किनारे बसे सिम्बिर्स्क में एक संपन्न व्यापारी परिवार में हुआ। सात बरस की उम्र में पिता चल बसे। उन्हें गढ़ा माँ अव्दोत्या ने और गॉडफ़ादर निकोलाई त्रेगुबोव ने, जो नौसेना के सेवानिवृत्त अफ़सर थे; उन्हीं से समुद्र का मोह और एक बड़ा पुस्तकालय मिला। मॉस्को के वाणिज्य विद्यालय में आठ नापसंद बरस काटने के बाद 1831 में उन्होंने मॉस्को विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग में प्रवेश लिया।
पढ़ाई पूरी कर वे सरकारी नौकरी में आए और पीटर्सबर्ग में वित्त मंत्रालय के अनुवादक रहे। उन्हीं वर्षों में मायकोव परिवार के घर जुटने वाली साहित्यिक मंडली से जुड़े; पहली कविताएँ और कहानियाँ उसी मंडली की पत्रिकाओं में छपीं। 1847 में छपे उपन्यास 'एक सामान्य कहानी' ने उन्हें पहचान दिलाई — बेलिंस्की ने उसे साल की सर्वश्रेष्ठ किताबों में गिना।
1852 में वे एडमिरल पुत्यातिन के सचिव के रूप में युद्धपोत पल्लाडा पर सवार हुए, इंग्लैंड, अफ़्रीका और जापान देखे और साइबेरिया होते हुए थल-मार्ग से लौटे। इसी यात्रा से 'युद्धपोत पल्लाडा' निकली। लौटकर उन्होंने सेंसर समिति में काम किया। 1857 की गर्मियों में मारिएनबाद में उन्होंने वर्षों से भीतर पल रहे 'ओब्लोमोव' को एक महीने में लिख डाला; उपन्यास 1859 में छपा और रूसी भाषा को 'ओब्लोमोवपन' शब्द दे गया। बीस बरस की मेहनत वाला 'खाई' 1869 में आया।
वे धीमे कथाकार थे, ब्योरों के प्रति धैर्यवान; घटना से अधिक उन्हें यह देखना था कि आदमी भीतर से कैसे गलता है और आदत इच्छाशक्ति को कैसे चाट जाती है। अंतिम वर्ष अकेलेपन और कड़वाहट में बीते: उन्होंने तुर्गेनेव पर अपने कथानक चुराने का आरोप लगाया और बाद की अधिकांश पांडुलिपियाँ जला दीं। उन्होंने विवाह नहीं किया। 1891 में पीटर्सबर्ग में निमोनिया से उनका देहांत हुआ।
गोंचारोव ने तब लिखा जब रूसी साहित्य यथार्थवाद की ओर मुड़ रहा था। बेलिंस्की के इर्द-गिर्द बनी 'प्राकृतिक धारा' ने रूमानी नायक की जगह साधारण आदमी का जीवन रख दिया। 1861 में भूदास प्रथा के अंत तक पहुँची बहस, पश्चिमपंथियों और स्लावप्रेमियों की टकराहट, तथा 1860 के दशक के युवा उग्रपंथियों और पुरानी कुलीन पीढ़ी के बीच की दरार उनके उपन्यासों की ज़मीन बनी। मोटी पत्रिकाएँ पाठक भी गढ़ती थीं और बहस भी, और दोब्रोल्युबोव के 'ओब्लोमोवपन क्या है?' जैसे लेख किसी उपन्यास को राजनीतिक बयान में बदल देते थे।