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इवान सर्गेयेविच तुर्गेनेव का जन्म 1818 में ओर्योल में एक संपन्न कुलीन परिवार के दूसरे बेटे के रूप में हुआ। पिता घुड़सवार सेना के कर्नल थे; ज़मीन और कृषिदास माँ वारवारा लुतोविनोवा के हाथ में थे, जो कठोर स्वभाव की महिला थीं। बचपन परिवार की स्पास्कोये जागीर में बीता, ऐसे घर में जहाँ केवल फ़्रेंच बोली जाती थी; रूसी उन्होंने मुख्यतः नौकरों से सीखी। मास्को विश्वविद्यालय में शुरू की पढ़ाई पीटर्सबर्ग में जारी रखी और फिर दर्शन पढ़ने बर्लिन चले गए।
साहित्य में वे कविता के रास्ते आए: 1843 में छपी कथा-कविता ‘पराशा’ ने पहली बार उनका नाम पहुँचाया। उसी वर्ष पीटर्सबर्ग में प्रस्तुति देने आईं गायिका पॉलीन वियार्दो से उनकी भेंट हुई; यह लगाव जीवन भर बना रहा और उन्हें यूरोप से बाँधे रखा। 1847 से पत्रिकाओं में छपती रहीं गाँव की कहानियाँ 1852 में ‘एक शिकारी के संस्मरण’ नाम से पुस्तक बनीं; कृषिदास प्रथा का रोज़मर्रा चेहरा दिखाने वाली इन रचनाओं की गूँज दूर तक गई।
1852 में गोगोल पर लिखा शोक-लेख, जिसे सेंसर ने रोक दिया था, उन्हें एक महीने की कैद दिला गया; उसके बाद उन्हें स्पास्कोये में निगरानी में रखा गया। बंदी रहते हुए उन्होंने ‘मुमू’ लिखी। ‘रूदिन’, ‘कुलीनों का नीड़’ और ‘पूर्व संध्या’ के बाद 1862 में ‘पिता और पुत्र’ आया। बाज़ारोव का ‘शून्यवादी’ रुख युवा उग्रपंथियों और पुरानी पीढ़ी, दोनों को नाराज़ कर गया; इस किताब से उठे विवाद ने तुर्गेनेव को रूस से दूर कर दिया। वे बाडेन-बाडेन में और बाद में पेरिस के पास रहे।
उनकी भाषा संयत थी और ब्योरे पर भरोसा करती थी; प्रकृति के वर्णन को वे पात्र की मनोदशा के साथ बुनते और स्वर ऊँचा किए बिना बहस चलाते थे। रूसी उपन्यास को पश्चिमी यूरोप तक पहुँचाने वाले वही थे: फ्लोबेर और ज़ोला से उनकी मित्रता रही और 1879 में ऑक्सफ़र्ड से मानद उपाधि मिली। 1877 में उनका अंतिम उपन्यास ‘कुँवारी धरती’ छपा। 3 सितम्बर 1883 को पेरिस के पास बूजिवाल में कैंसर से उनका निधन हुआ; पार्थिव शरीर रूस लाया गया और पीटर्सबर्ग के वोल्कोवो कब्रिस्तान में दफ़नाया गया।
तुर्गेनेव ने उन वर्षों में लिखा जब रूस पश्चिमी राह के विवाद से हिला हुआ था। स्लावोफिल और पश्चिमवादियों के बीच की दरार, 1861 में कृषिदास प्रथा का अंत और उसके बाद उभरा पीढ़ियों का टकराव सीधे उनके उपन्यासों का विषय बने। ‘सोव्रेमेन्निक’ के इर्द-गिर्द जुटे उग्र आलोचकों और उदार कुलीनों के बीच फँसे इस लेखक को दोनों ओर से आलोचना मिली, ऐसे साहित्य में जहाँ यथार्थवाद सामाजिक सवालों की कसौटी बन चुका था। क्रांतिकारी आंदोलन के मज़बूत होते अंतिम वर्षों में भी यह बहस चलती रही कि वे किस खेमे के हैं।