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निकोलाई गोगोल का जन्म 1809 में पोल्तावा क्षेत्र के सोरोचिंत्सी कस्बे में एक छोटे ज़मींदार परिवार में हुआ। उनके पिता वसीली गोगोल-यानोव्स्की शौकिया नाटक लिखते और उन्हें अपने ही घर में खेलते थे; गोगोल पंद्रह बरस के थे जब वे चल बसे। बीमार रहने वाला और अपने में सिमटा यह बच्चा नेझिन के स्कूल में अपनी तीखी ज़बान और स्कूली नाटकों में निभाए बूढ़ों के किरदारों के लिए जाना गया।
1828 में वे नाम कमाने पीटर्सबर्ग पहुँचे। अभिनेता बनने की कोशिश बेकार गई और अपने ख़र्च पर छपवाई कविता हांस क्युशेलगार्टन की जब कड़ी आलोचना हुई तो उन्होंने जितनी प्रतियाँ मिलीं, सब बटोरकर जला दीं। मामूली सरकारी नौकरी करते हुए लिखी यूक्रेनी गाँव-कथाओं की किताब दिकांका के पास एक खेत पर शामें (1831-32) ने उन्हें रातोंरात पहचान दिलाई और पुश्किन की दोस्ती भी।
1835 में मिरगोरोद और अरबेस्क छपीं; अगले बरस मंच पर आए महानिरीक्षक ने प्रांतीय अफ़सरों का मज़ाक उड़ाकर बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया। प्रतिक्रियाओं से थककर गोगोल रूस छोड़ गए और अगले बारह में से अधिकांश वर्ष रोम में बिताए, जहाँ मृत आत्माएँ का पहला खंड लिखा। 1847 में छपी मित्रों के साथ पत्राचार से चुने हुए अंश ने उन्हीं आलोचकों को उनके ख़िलाफ़ कर दिया जो अब तक उनका बचाव करते आए थे; बेलिंस्की की क्रोध भरी चिट्ठी ने उन्हें भीतर तक हिला दिया।
गोगोल की क़लम हास्य और भय को एक ही वाक्य में थामे रखती है: ओवरकोट का बेरंग मुंशी हो या मृत आत्माएँ की प्रांतीय हवेलियाँ, दोनों हँसाते भी हैं और बेचैन भी करते हैं। रूसी गद्य की यथार्थवादी धारा बहुत हद तक इसी दृष्टि से निकली। 1848 में वे यरूशलम की तीर्थयात्रा पर गए; आख़िरी वर्ष धार्मिक संकट में बीते। फ़रवरी 1852 में उन्होंने मृत आत्माएँ के दूसरे खंड की पांडुलिपि आग के हवाले कर दी, अन्न छोड़ दिया और कुछ ही दिनों बाद बयालीस बरस की उम्र में मॉस्को में उनका देहांत हो गया।
गोगोल ने ऐसे रूस में लिखा जिसे निकोलस प्रथम सेंसरशिप और जेंडार्मरी के बल पर चलाते थे और जहाँ भूदास प्रथा ज्यों की त्यों क़ायम थी। वे रूमानियत से यथार्थवाद की ओर मुड़ते समय के बीचोंबीच खड़े थे: पुश्किन की पीढ़ी की कविता गद्य को जगह दे रही थी और बेलिंस्की के इर्द-गिर्द जुटे आलोचक साहित्य से सामाजिक सच्चाई और रोज़मर्रा की भाषा माँग रहे थे। जिन वर्षों में पश्चिमपंथी और स्लावोफ़ाइल देश की दिशा पर उलझे हुए थे, उनके प्रांतीय अफ़सर और ज़मींदार दोनों पक्षों ने अपने-अपने पक्ष के सबूत की तरह पढ़े।