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महमुत एक्रेम का जन्म 1 मार्च 1847 को इस्तांबुल के बोस्फ़ोरस तट पर बसे वानिकोय में हुआ। उनके पिता रेजाई मेहमेत शाकिर एफ़ेंदी राजकीय पंचांग विभाग के प्रमुख रह चुके थे और कवि तथा सुलेखक के रूप में जाने जाते थे; घर का पुस्तकालय ही बालक की पहली पाठशाला बना। अरबी और फ़ारसी उन्होंने पिता से सीखी। बेयाज़ित के माध्यमिक विद्यालय के बाद वे मेक्तेब-इ इरफ़ान गए और सैनिक तैयारी विद्यालय में भर्ती हुए, पर बीमारी के कारण उसे छोड़ना पड़ा।
1862 में वे विदेश मंत्रालय के लेखन-कार्यालय में आए, जहाँ पुरानी शायरी के उस्तादों से भी और नामिक केमाल से भी उनका परिचय हुआ। 1867 में यूरोप भागते समय केमाल ने अख़बार ‘तस्विर-इ एफ़कार’ उन्हें सौंप दिया। पहला काव्य-संग्रह ‘नग़मे-इ सेहर’ 1871 में छपा, और उसकी भाषा अब भी दीवान काव्य की भाषा थी।
1878 से 1887 तक उन्होंने मेक्तेब-इ सुल्तानी और प्रशासनिक महाविद्यालय में साहित्य पढ़ाया। उनके व्याख्यानों से बनी ‘तालीम-इ एदेबियात’ को पूर्व की अलंकार-परंपरा से पश्चिमी शैलीशास्त्र तक ले जाने वाली किताब माना गया और इसी से उन्हें ‘उस्ताद’ कहा जाने लगा। ‘ज़ेमज़ेमे’ की भूमिकाओं में जिस नएपन की उन्होंने वकालत की, मुअल्लिम नाजी ने ‘देमदेमे’ से उसका उत्तर दिया; पुराने और नए का यह झगड़ा इतना तीखा हुआ कि सरकार को बीच में पड़ना पड़ा। 1896 में अपने शिष्यों का पक्ष लेते हुए उन्होंने ‘सेर्वेत-इ फ़ुनून’ पत्रिका के द्वार युवा लेखकों के लिए खुलवाने में मदद की।
कविता में उन्होंने विचार, भाव और कल्पना को आधार माना; यह कहकर कि कण से लेकर सूर्य तक जो कुछ सुंदर है वह कविता का विषय बन सकता है, उन्होंने विषय की सीमाएँ हटा दीं, और यह भी कहा कि हर छंदबद्ध तथा तुकांत वाक्य कविता नहीं होता। उसी वर्ष धारावाहिक रूप में छपा ‘बग्घी का प्रेम’ पश्चिमीकरण को दिखावा समझ बैठे बिहरुज़ बे के हास्यास्पद मोह के कारण तुर्की का पहला यथार्थवादी उपन्यास माना जाता है। तीनों संतानें उनके सामने ही चल बसीं; 1900 में बेटे निजात की मृत्यु के बाद लिखे उनके पन्ने सबसे मर्मस्पर्शी हैं। 31 जनवरी 1914 को इस्तांबुल में उनका देहांत हुआ और कुचुकसू क़ब्रिस्तान में बेटे के पास उन्हें दफ़नाया गया।
एक्रेम तंज़ीमात की दूसरी पीढ़ी के हैं। शिनासी और नामिक केमाल जिन वर्षों में साहित्य को समाज से संवाद का साधन बना रहे थे, उनके बाद एक्रेम ने अब्दुलहमीद द्वितीय की सेंसरशिप के उस माहौल में लिखा जहाँ राजनीति बंद थी, और कला को अपने आप में उद्देश्य माना। उपन्यास और नाटक अभी नई विधाएँ थीं, साहित्य की भाषा अख़बार के साथ सरल हो रही थी। वे पुराने-नए के विवाद के ठीक बीच खड़े रहे; उनका खोला रास्ता 1896 में सेर्वेत-इ फ़ुनून पीढ़ी तक पहुँचा।