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याकुप कादरी काराओस्मानोग्लू का जन्म 27 मार्च 1889 को काहिरा में हुआ। उनके पिता अब्दुलकादिर बे मानिसा के पुराने रईस घराने काराओस्मानज़ादे से थे और माँ का नाम इक़बाल हानिम था। छह बरस की उम्र में परिवार मानिसा आ बसा, वहीं उनकी पढ़ाई शुरू हुई और आगे चलकर इज़मीर के उच्च विद्यालय में जारी रही। पिता की मृत्यु के बाद परिवार मिस्र लौट गया और उन्होंने अपनी पढ़ाई सिकंदरिया के एक फ़्रांसीसी स्कूल में पूरी की।
1908 में वे इस्तांबुल आए और क़ानून की पढ़ाई में दाख़िल हुए, पर डिग्री कभी नहीं ली। अगले बरस वे साहित्यिक मंडली फ़ेजर-ए आती के संस्थापकों में शामिल हुए और उनकी पहली रचनाएँ इसी हलक़े की पत्रिकाओं में छपीं। तपेदिक के इलाज के लिए तीन साल स्विट्ज़रलैंड में रहे। लौटकर उन्होंने ‘इक़दाम’ अख़बार में लिखा और ‘किरालिक कोनाक’ (‘किराए की हवेली’) छापी, जिसमें एक हवेली की तीन पीढ़ियों के सहारे साम्राज्य का ढहना दर्ज है; अपनी गद्य कविताएँ उन्होंने ‘एरेनलेरिन बाउन्दान’ में समेटीं।
1921 में वे युद्ध के अत्याचारों की जाँच करने वाली समिति के साथ पश्चिमी अनातोलिया घूमे और उजड़े हुए गाँव देखे; इस यात्रा ने उनके लेखन की दिशा बदल दी। गणराज्य बनने के बाद वे मार्दिन और फिर मानिसा से सांसद रहे और 1932 में ‘कादरो’ पत्रिका की स्थापना में साथ दिया। इन्हीं वर्षों में ‘याबान’ (‘अजनबी’) आई, जो बुद्धिजीवी और किसान के बीच की खाई पर है, और ‘अंकारा’, जो नई राजधानी के जन्म का पीछा करती है। 1934 से वे तिराना, प्राग, हेग, बर्न और तेहरान में राजदूत रहे।
उनकी भाषा सजावट से रहित और निरीक्षण पर टिकी थी; उपन्यास को उन्होंने सामाजिक विश्लेषण का औज़ार माना और तुर्की गद्य को इतिहास की रीढ़ दी। ‘पानोरामा’ में उन्होंने साम्राज्य से गणराज्य तक पहुँची पीढ़ियों का हिसाब लगाया और संस्मरणों में अपने अंतर्विरोध भी लिख डाले। 1961 में वे फिर संसद में लौटे और 1965 में राजनीति छोड़ दी। 13 दिसंबर 1974 को अंकारा में उनका निधन हुआ और बेशिकताश के याह्या एफ़ेंदी क़ब्रिस्तान में उन्हें दफ़नाया गया।
काराओस्मानोग्लू ने उस दरार पर लिखा जो उस्मानी साम्राज्य के आख़िरी वर्षों और गणराज्य की स्थापना के बीच थी। शुरुआत फ़ेजर-ए आती की वैयक्तिक, सौंदर्यवादी खोज से हुई, फिर वे सरल भाषा और अनातोलिया की ओर मुड़ने वाले राष्ट्रीय साहित्य से जुड़े। बाल्कन युद्ध, पहला विश्वयुद्ध, क़ब्ज़े में पड़ा इस्तांबुल और स्वाधीनता संग्राम उनकी किताबों की ज़मीन बने। बाद में ‘कादरो’ के इर्द-गिर्द उन्होंने राज्य-प्रेरित आधुनिकीकरण का पक्ष लिया और बुद्धिजीवी के जनता से कटने की बहस के ठीक बीच खड़े रहे।