
Aziz Augustinus
हिप्पो के ऑगस्टीन की 'कन्फेशन्स' (स्वीकारोक्तियाँ) 397 और 400 ईस्वी के बीच लिखी गई एक दार्शनिक और धर्मशास्त्रीय उत्कृष्ट कृति है, जिसे व्यापक रूप से पश्चिमी साहित्य की पहली सच्ची आत्मकथा माना जाता है। अपने पापपूर्ण अतीत, मैनीकेइज्म से ईसाई धर्म में अपने रूपांतरण, और ईश्वर तक पहुँचने के अपने संघर्ष को ईमानदारी से बताकर, ऑगस्टीन आध्यात्मिक चिंतन और आत्म-आलोचना का एक कार्य प्रस्तुत करते हैं।
मुख्य पात्र के प्रसिद्धि, कामुकता और सांसारिक सफलता जैसी शारीरिक वासनाओं से बनी आदतों की जंजीरों और परम सत्य व ईश्वर को पाने की आध्यात्मिक आकांक्षा के बीच होने वाला तीव्र आंतरिक इच्छाशक्ति का संघर्ष।
उत्तरी अफ्रीकी शहर तगास्ते (जन्मस्थान), कार्थेज (विद्यार्थी जीवन और प्रारंभिक अध्यापन के वर्ष), रोम तथा उत्तरी इटली का मिलान और ओस्तिया शहर।
उत्तर प्राचीन काल / रोमन साम्राज्य काल (ईसा पश्चात चौथी शताब्दी, लगभग 354 - 430 ईस्वी)
गहन रूप से आत्मनिरीक्षणात्मक, आध्यात्मिक, पश्चाताप से भरा और दार्शनिक वातावरण। लेखक का आत्म-मंथन, ईश्वर के प्रति विस्मय और श्रद्धा, पापों की स्वीकारोक्ति से उत्पन्न दुःख और अंततः सत्य को पाने से मिलने वाली शांति की अनुभूति पाठ को एक गहन धर्मशास्त्रीय गंभीरता प्रदान करती है।
प्रथम पुरुष लेखक-वाचक (ऑगस्टीन)। पूरी पुस्तक सीधे ईश्वर को संबोधित करते हुए, उनसे याचना करने और अपनी भावनाएं व्यक्त करने वाली प्रार्थना, कृतज्ञता और स्वीकारोक्ति की शैली में लिखी गई है।
संपूर्ण ब्रह्मांड और उसमें मौजूद सब कुछ एकमात्र, शाश्वत और परम कल्याणकारी ईश्वर द्वारा शून्य से रचा गया है। बुराई अपने आप में कोई पदार्थ या तत्व नहीं है, बल्कि अच्छाई का अभाव और इच्छाशक्ति का ईश्वर से विमुख होकर निकृष्ट सांसारिक वस्तुओं की ओर मुड़ना है। यद्यपि मनुष्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से पाप करता है, परंतु मुक्ति और सच्ची प्रसन्नता केवल दैवीय अनुग्रह (कृपा) के माध्यम से अंतर्मुखी होकर ईश्वर को पाने से ही संभव है।
रोमन साम्राज्य में एक संक्रमण काल, जब बुतपरस्ती (पैगनिज़्म) अंतिम सांसें ले रही थी और ईसाई धर्म सशक्त हो रहा था। एक ऐसी संस्कृति प्रभावी थी जहाँ बौद्धिक हलकों में मानी धर्म (मानीवाद) जैसे द्वैतवादी विश्वासों और नव-प्लेटोवादी दर्शनों पर गहन चर्चाएं होती थीं, और शास्त्रीय वक्तृत्व कला एवं भाषण कला की शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता था।
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ऑगस्टीन अपनी गलतियों और पापों के कारण बार-बार ईश्वर से दूर चला जाता है, फिर भी वह अनुभव करता है कि ईश्वर सदैव उसके भीतर मौजूद हैं और दयापूर्वक उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। शुरुआत में इनकार और विद्रोह के अंश वाला यह संबंध अंततः गहरे प्रेम, पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता में बदल जाता है।
हे शाश्वत सत्य, हे सच्चे प्रेम, हे प्रिय अनंतता! तुम ही मेरे ईश्वर हो, दिन-रात मैं तुम्हारी ही कामना करता हूँ।
यह एक अत्यंत आध्यात्मिक संबंध है, जिसमें मोनिका अपने पुत्र के सांसारिक और भटके हुए रास्तों से मुक्त होकर आध्यात्मिक उद्धार पाने के लिए निरंतर और दृढ़तापूर्वक प्रार्थना करती है। ऑगस्टीन अपनी युवावस्था में माँ की धार्मिक सलाहों की उपेक्षा करता है, परंतु सत्य की प्राप्ति होने पर वह अपनी माँ को आध्यात्मिक सहयात्री और अपने उद्धार का साधन मानकर उनका गुणगान करता है।
मेरी माँ ने जब अंतिम सांस ली... उन्होंने अपनी सेवा-सुश्रूषा के लिए मेरी प्रशंसा की और बड़े प्रेम से कहा कि मैं एक अच्छा पुत्र रहा हूँ।
ऑगस्टीन बताते हैं कि उनके पिता केवल उनके शारीरिक और सांसारिक विकास (वक्तृत्व की शिक्षा, धन-संपत्ति, पोते-पोतियों) में रुचि रखते थे, उनकी नैतिक या आध्यात्मिक स्थिति में नहीं। यह एक औपचारिक तथा मुख्यतः सांसारिक महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द बना संबंध है।
मेरे पिता का ईसाई धर्म अपनाने का कोई विशेष इरादा नहीं था... वे मुझे लेकर निरर्थक सपनों में खोए हुए थे।
मोनिका अपने क्रोधी और मूर्तिपूजक पति के गुस्से का उत्तर धैर्य, धर्मपरायणता और मौन से देती है। पारंपरिक और पितृसत्तात्मक व्यवस्था में अपने पति के प्रति नम्र रहकर वह उनका क्रोध शांत करती है और अंततः उनके जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
पति अपने गुणों के कारण अपनी पत्नी से प्रेम करता था, उसका सम्मान करता था और उसकी सराहना करता था। वह सामान्यतः एक अच्छा व्यक्ति था परंतु बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता था; मेरी माँ ने सीख लिया था कि जब वह क्रोध में हों तो शब्दों या कर्मों से कोई प्रतिक्रिया न दी जाए।
वे बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। ऑगस्टीन अपने आध्यात्मिक संकटों में हमेशा एलीपीयस को अपने साथ पाते हैं। उनके संघर्ष और दार्शनिक खोज समान हैं; वे पाप की जंजीरों को तोड़कर एक साथ ही ईसाई धर्म को स्वीकार करते हैं।
हृदय रूपी उस गुप्त कक्ष में अपनी आत्मा के साथ हुए प्रचंड अंतर्द्वंद्व से व्याकुल चेहरे के साथ मैंने अलिपियस का कॉलर पकड़ लिया और उसके मुँह पर चीख पड़ा।
सत्य की खोज के मार्ग में ऑगस्टीन का सहयात्री, दार्शनिक प्रश्न पूछने वाला एक बुद्धिमान मित्र। सत्य की खोज में वे दोनों अफ्रीका से इटली तक साथ रहे और अत्यंत निष्ठा से सत्य पर विचार-विमर्श किया।
नेब्रिडियस ने भी कार्थेज के निकट अपने वतन को छोड़... मेरे साथ रहने और सत्य तथा ज्ञान की खोज करने का निर्णय लिया था।
ऑगस्टीन शुरू में मिलान के बिशप एम्ब्रोस के पास केवल उनकी उत्कृष्ट वाकपटुता और वक्तृत्व कौशल के कारण जाता है, किंतु समय के साथ पवित्र ग्रंथों की उनकी गहरी आध्यात्मिक व्याख्याओं के माध्यम से कैथोलिक सत्य के प्रति उसका हृदय खुल जाता है। एम्ब्रोस ऑगस्टीन के आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बनते हैं।
मेरी अनभिज्ञता में तू मुझे उसके पास ले गया, ताकि वह जान-बूझकर मुझे तेरे पास ले आए। ईश्वर के इस जन ने एक पिता की भाँति मेरा स्वागत किया।
ऑगस्टीन लंबे समय तक मानी धर्म के सबसे प्रमुख प्रतिनिधि फॉस्टस की प्रतीक्षा करता है, किंतु जब वह उससे मिलता है, तो उसे ज्ञात होता है कि फॉस्टस दर्शन और विज्ञान से अनभिज्ञ, केवल अलंकृत शब्दों में बोलने वाला एक उथला व्यक्ति है। इसी कारण ऑगस्टीन का मानी धर्म से मोहभंग हो जाता है।
जिस क्षेत्र में मैंने उसे अद्वितीय समझा था, उसमें जब उसे अज्ञानी पाया, तो मेरे मन को मथने वाले प्रश्नों को सुलझाने की उसकी क्षमता पर से मेरा विश्वास उठ गया।
ऑगस्टीन के विवाहेतर संबंध से उत्पन्न पुत्र। ऑगस्टीन अपने पुत्र की कुशाग्र बुद्धि से अत्यधिक प्रभावित था और यह जानते हुए भी कि वह उसके अपने पाप का फल है, उसे ईश्वर द्वारा प्रदत्त वरदान मानकर बपतिस्मा के समय उसे भी आध्यात्मिक रूप से अपने साथ सम्मिलित करता है।
मेरे पाप के फल स्वरूप जन्मे युवा अदियोदातुस को भी हमने अपने साथ जोड़ लिया... इस बालक में मेरे और मेरे पाप के सिवा और कुछ न था।
ऑगस्टीन जब अपनी इच्छाशक्ति की दुर्बलता से जूझ रहा था, तब उसने वृद्ध और ज्ञानी सिम्प्लिसियानस से परामर्श लिया। सिम्प्लिसियानस द्वारा सुनाई गई विक्टोरिनस के धर्म-परिवर्तन की गाथा ने ऑगस्टीन को अपने अहंकार और भयों से मुक्त होने की प्रेरणा दी।
जैसे ही सिम्प्लिसियानस ने मुझे विक्टोरिनस के ईसाई बनने की बात बताई, वैसे ही मैं भी उसका अनुसरण करने के लिए उत्सुक हो उठा।