
Arthur Danto
फ्रेडरिक नीत्शे (1844-1900) एक युगांतरकारी जर्मन दार्शनिक, भाषाविद् और सांस्कृतिक आलोचक थे, जिन्होंने पश्चिमी तत्वमीमांसा, धर्म और पारंपरिक नैतिकता की कठोर आलोचना की। उन्होंने "ईश्वर की मृत्यु," "अतिमानव" (Übermensch) और "शक्ति की इच्छा" जैसी अवधारणाओं के साथ आधुनिक चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।
मनुष्य को दुर्बल करने वाली, शरीर और इस संसार को नकारने वाली दब्बू 'दास-नैतिकता' (पश्चिमी तत्वमीमांसा और ईसाई धर्म) तथा जीवन, खतरे और शक्ति का वरण करने वाले, पीड़ा और त्रासदी को जीवन के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार कर 'अतिमानव' का लक्ष्य रखने वाले आनंदमयी, त्रासद और सृजनशील जीवन-दर्शन ('स्वामी-नैतिकता') के बीच का अस्तित्ववादी और बौद्धिक संघर्ष।
यूरोप का बौद्धिक परिदृश्य (लाइपज़िग, बेसल, सिल्स-मारिया) और मानव मन व संस्कृति की दार्शनिक गहराइयाँ।
19वीं सदी का उत्तरार्ध (दार्शनिक संदर्भ में प्राचीन यूनान से लेकर आधुनिकता तक के संपूर्ण दर्शन इतिहास को समाहित करता है)।
संकट, जागरण और बौद्धिक विद्रोह से परिपूर्ण; एक ओर स्थापित व्यवस्था को हथौड़े से ध्वस्त करने वाली कठोर और झकझोर देने वाली आलोचना, तो दूसरी ओर जीवन का पूरे उल्लास से उत्सव मनाने वाला दायोनिसियाई स्वीकृति का वातावरण।
विश्लेषणात्मक, आलोचनात्मक, यत्र-तत्र जीवनीपरक और अवधारणाओं की जड़ों को कुरेदने वाला (वंशावलीय) अकादमिक स्वर।
ब्रह्मांड में कोई 'वस्तुनिष्ठ' या 'स्वतःसिद्ध' सत्य, नैतिक विश्व-व्यवस्था या सार्वभौमिक नियम नहीं हैं; केवल 'सत्ता की इच्छा' के इर्द-गिर्द आकार लेने वाली व्याख्याएँ और दृष्टिकोण हैं। अस्तित्व कोई स्थिर सत्ता नहीं, बल्कि एक अंतहीन 'निर्माण' और प्रवाह की स्थिति है। ब्रह्मांड में ऊर्जा सीमित है और समय अनंत; इसलिए घटित होने वाली प्रत्येक घटना अनगिनत बार पुनः घटित होगी (शाश्वत पुनरावृत्ति)। पारंपरिक भले-बुरे के भेद केवल शक्ति-संबंधों का ही एक प्रतिबिंब हैं।
विक्टोरियाई युगीन यूरोप की कठोर नैतिकता, प्रबोधनोत्तर प्रत्यक्षवादी/तर्कसंगत आशावाद, जर्मन राष्ट्रवाद तथा 2500 वर्ष पुरानी प्लेटोवादी/ईसाई पश्चिमी तत्वमीमांसा की परंपरा द्वारा निर्मित सांस्कृतिक संकट का दौर।
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प्रारंभ में संगीत, कला और शोपेनहावर के दर्शन पर आधारित एक गहरा सम्मोहन और गुरु-शिष्य संबंध था, जो समय के साथ एक वैचारिक युद्ध में बदल गया। वैगनर का यहूदी-विरोधी रवैया और पार्सिफ़ाल के माध्यम से ईसाई रहस्यवाद की ओर झुकाव नीत्शे को उनसे पूरी तरह अलग कर देता है।
1878 में जब नीत्शे ने वैगनर के ओपेरा पार्सिफ़ाल को ईसाई मूल्यों की ओर वापसी के रूप में देखा, तो उनकी मित्रता समाप्त हो गई।
नीत्शे अपनी युवावस्था में शोपेनहावर के निराशावादी 'अंधी इच्छा' के दर्शन से अत्यधिक प्रभावित हुए। किंतु समय के साथ उन्होंने इस इच्छा से पलायन (निर्वाण/तपस्या) के विचार को अस्वीकार कर दिया और उसके स्थान पर जीवन को स्वीकार करने वाली 'सत्ता की इच्छा' को स्थापित कर अपने गुरु का अतिक्रमण किया।
ब्रह्मांड के मूल में एक अंधी इच्छा के होने के विचार को अपनाने वाले नीत्शे ने बाद में शोपेनहावर को शून्यवाद के युग का निराशावादी दार्शनिक कहकर उनसे अपनी राहें अलग कर लीं।
ज़रथुस्त्र नीत्शे के दार्शनिक दृष्टिकोण और उनके गहनतम विचारों (ईश्वर की मृत्यु, अतिमानव, शाश्वत पुनरावृत्ति) को जनमानस तक पहुँचाने वाले दूत और साहित्यिक मुखौटा हैं। नीत्शे अपने आदर्शों को इसी चरित्र के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।
नीत्शे को मानो अंतःप्रेरणा से प्राप्त हुए विचारों को वे फ़ारसी ऋषि ज़रथुस्त्र की वाणी के माध्यम से व्यक्त करते हैं।
नीत्शे सुकरात को पश्चिमी तर्कवाद का संस्थापक और प्रवाह को नकारने वाले सैद्धांतिक मनुष्य की शुरुआत मानते हैं। प्रारंभ में वे त्रासदी की मृत्यु के लिए सुकरात को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं, और समय-समय पर इस व्यक्तित्व के प्रति एक जटिल प्रशंसा और तीव्र आलोचना दोनों विकसित करते हैं।
नीत्शे का तर्क है कि सुकरात के बाद से पश्चिमी तत्वमीमांसा परंपरा परिवर्तन के पीछे एक अपरिवर्तनीय तत्व खोजने में व्यस्त रही है और इसी ने शून्यवाद को जन्म दिया है।
नीत्शे के अनुसार प्लेटो 'वास्तविक संसार' और 'आभासी संसार' का मनगढ़ंत भेद पैदा करके जीवन को मूल्यहीन बना देने वाले तत्वमीमांसक रोग के जनक हैं। नीत्शे अपनी पूरी दार्शनिक परियोजना को प्लेटोवाद और उसके जनसाधारण रूप, यानी ईसाई धर्म, को ध्वस्त करने पर केंद्रित करते हैं।
प्लेटोवाद और ईसाई धर्म को मानवता को शून्यवाद की ओर ले जाने वाले रूपों के रूप में कड़ाई से खारिज किया गया है।
कृति की दुनिया में ज़रथुस्त्र जहाँ जीवन, देह और अराजकता के भीतर के तारे (सृजन) के प्रवक्ता हैं; वहीं सुकरात विशुद्ध तर्क, नैतिक सार्वभौमिकता और त्रासदी को बहिष्कृत करने वाले हठधर्मिता के प्रतीक हैं।
ज़रथुस्त्र का उद्देश्य सुकराती तर्कवाद द्वारा सुखाई गई वासनाओं को पुनः एक रचनात्मक शक्ति (अतिमानव) में बदलना है।
दोनों ने ही जर्मन संस्कृति पर गहरी छाप छोड़ी और नीत्शे के युवावस्था के 'संगीत/कला के माध्यम से अंधी इच्छाशक्ति से मुक्ति' के विचार की नींव रखी।
नीत्शे अपने प्रारंभिक दौर में शोपेनहावर के इच्छाशक्ति के दर्शन और वैगनर के संगीत के बीच एक संबंध स्थापित करने के प्रयास में हैं।
सुकरात का तर्कवाद, प्लेटो के सैद्धांतिक तत्वमीमांसा के साथ व्यवस्थित हुआ; नीत्शे के शब्दों में, उन्होंने पश्चिम के जीवन-नकारात्मक 'तपस्वी आदर्श' और शून्यवाद की जड़ें जमाईं।
पश्चिमी तत्वमीमांसा की परंपरा ऐसे युगों के रूप में आगे बढ़ी है, जिनमें से प्रत्येक प्लेटोवाद के ही विभिन्न रूप या संस्करण रहे हैं।