एरिक आर्थर ब्लेयर का जन्म 1903 में ब्रिटिश भारत के छोटे-से क़स्बे मोतिहारी में हुआ। पिता औपनिवेशिक अफ़ीम विभाग में अफ़सर थे; बेटा साल भर का हुआ तो माँ आइडा बच्चों को लेकर इंग्लैंड लौट आईं। वह एक बड़ी और एक छोटी बहन के बीच, तंग तनख़्वाह वाले एक सरकारी कर्मचारी के घर में बड़ा हुआ। रियायती फ़ीस पर मिले बोर्डिंग स्कूल में और फिर ईटन में उसने जल्दी ही जान लिया कि अमीरों के बीच ग़रीब छात्र होना क्या होता है। विश्वविद्यालय जाने के बजाय उसने 1922 के अंत में बर्मा जाकर इम्पीरियल पुलिस की नौकरी ले ली। पाँच बरस जिस व्यवस्था को उसे ख़ुद क़ायम रखना पड़ा, उससे उकताकर उसने इस्तीफ़ा दिया और लिखने का फ़ैसला किया। पेरिस में उसने बर्तन धोए, लंदन में बेघरों के बीच दिन काटे; उन्हीं वर्षों की डायरी से निकली किताब पेरिस और लंदन में बदहाली 1933 में जॉर्ज ऑरवेल के नाम से छपी। 1936 में उत्तरी इंग्लैंड के खदान-मज़दूरों के घरों में बिताए हफ़्तों ने ग़रीबी को उसके क़रीब ला दिया; उसी साल के अंत में वह स्वयंसेवक बनकर स्पेनी गृहयुद्ध में गया, गले में गोली खाई और अपने ही खेमे की सफ़ाइयों से बचकर लौटा। कातालोनिया को श्रद्धांजलि उसी दरार की किताब है: इसके बाद ऑरवेल ने फ़ासीवाद जितनी ही सख़्ती से स्तालिनवाद के ख़िलाफ़ लिखा। युद्ध के वर्षों में उसने बीबीसी के भारत-प्रसारण संभाले, फिर ट्रिब्यून में स्तंभ लिखा। वह खिड़की के काँच जैसा पारदर्शी गद्य चाहता था और राजनीति की भाषा को गँदला करने वाली हर चीज़ के ख़िलाफ़ सादगी को हथियार मानता था। 1945 में उसकी पत्नी आइलीन नहीं रहीं; उसी बरस पशु फ़ार्म छपी। तपेदिक बढ़ते हुए उसने स्कॉटलैंड के जूरा द्वीप पर 1984 लिखी, जो 1949 में आई। जनवरी 1950 में छियालीस बरस की उम्र में लंदन में उसका देहांत हुआ; “बिग ब्रदर” और “न्यूज़स्पीक” उसके साथ रोज़मर्रा की ज़बान में दाख़िल हो गए।
20वीं सदी के मध्य का, ब्रिटिश, ट्वीड जैकेट पहने हुए, पतली मूंछें, चेहरे पर मौसम की मार और कठोर भाव।