मारियो पूजो का जन्म 15 अक्टूबर 1920 को न्यूयॉर्क के हेल्स किचन मोहल्ले में हुआ, एक ऐसे इतालवी परिवार में जो आवेल्लीनो के इलाके से आकर बसा था। पिता रेलवे में पटरी की मरम्मत का काम करते थे; पूजो बारह बरस के थे जब सिज़ोफ्रेनिया की पहचान के साथ उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। माँ मारिया ने सात बच्चों को अकेले पाला। लेखक का बचपन उसी गरीब प्रवासी मोहल्ले में बीता, जहाँ पढ़ना ही उसकी शरण थी। दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होंने अमेरिकी वायुसेना के साथ जर्मनी में सेवा की और लौटकर सिटी कॉलेज ऑफ न्यूयॉर्क में पढ़ाई की। पहली कहानी 1950 में छपी। युद्ध के बाद के जर्मनी पर लिखा 'अंधेरा अखाड़ा' (1955) और माँ के प्रवासी जीवन से उपजा 'भाग्यवान तीर्थयात्री' (1964) समीक्षकों को भाए, पर पाठक लगभग नहीं मिले। गुज़ारा वे छद्म नाम से पुरुष पत्रिकाओं के लिए कहानियाँ लिखकर करते रहे। पैंतालीस की उम्र, पाँच बच्चे और सिर पर कर्ज़ — उनके अपने शब्दों में, अब बड़ा होकर खुद को बेच देने का वक़्त था। 'द गॉडफादर' 1969 में आया, दो साल में नब्बे लाख से अधिक प्रतियाँ बिकीं और वह सड़सठ हफ़्ते बेस्टसेलर सूची में टिका रहा। फ्रांसिस फोर्ड कोपोला के साथ लिखी पहली दो फ़िल्मों ने उन्हें दो ऑस्कर दिलाए; 'सुपरमैन' की पटकथा भी उन्हीं की है। पूजो कहा करते थे कि उन्होंने कभी किसी असली माफिया सरदार को देखा तक नहीं। अपराध के संगठन को एक परिवार की तरह, वफ़ादारी और उधार की एक व्यवस्था की तरह गढ़ने ने अमेरिकी लोकप्रिय उपन्यास की अपराध-दृष्टि बदल दी। अपनी सबसे प्रिय किताब वे 'भाग्यवान तीर्थयात्री' को मानते थे और इस बात का मलाल रखते थे कि 'द गॉडफादर' ने उसे ढँक दिया। 'द सिसिलियन' और 'द लास्ट डॉन' के बाद, 2 जुलाई 1999 को लॉन्ग आइलैंड स्थित अपने घर में दिल की विफलता से उनका निधन हुआ।
20वीं सदी के मध्य का संयुक्त राज्य अमेरिका, मजबूत गठन, गंजापन, चश्मा पहने हुए, 1970 के दशक की औपचारिक लेकिन सहज पोशाक।