पेयामी सफ़ा का जन्म 2 अप्रैल 1899 को इस्तांबुल के गेदिकपाशा मोहल्ले में हुआ। उनका नाम उनके पिता के मित्र, कवि तेवफ़िक फ़िक्रेत ने रखा था। पिता इस्माइल सफ़ा सेर्वेत-ए फ़ुनून मंडली के कवि थे; अब्दुलहमीद द्वितीय की सरकार ने उन्हें सिवास निर्वासित किया और वहीं उनकी मृत्यु हुई — तब पेयामी डेढ़ बरस के थे। माँ सेर्वेर बेदिया ने दोनों बेटों को तंगी में पाला। नौ की उम्र में दाहिनी बाँह में उभरे हड्डी के तपेदिक ने उनका बचपन अस्पताल के गलियारों में बिता दिया; 1910 में जिस वेफ़ा हाई स्कूल में दाख़िल हुए, वह पूरा न कर सके। पढ़ाई उन्होंने अपने बल पर जारी रखी और फ़्रेंच भी ख़ुद ही सीख ली। अठारह की उम्र में एक स्कूल में पढ़ाया और युद्ध के वर्षों में डाक विभाग में काम किया। बड़े भाई इल्हामी के साथ निकाले जाने वाले अख़बार 'यिरमिंजी असिर' में 'सदी की कहानियाँ' शीर्षक से छपी कहानियों ने उन्हें पहले पाठक दिए। इसके बाद क़लम रोज़ी बन गई — 'तेरजुमान-ए हकीकत', 'जुम्हूरियेत' और 'तान' जैसे अख़बारों में। सेर्वेर बेदी नाम से लिखे लोकप्रिय उपन्यास और चिंगोज़ रेजाई की शृंखला इसी ज़रूरत से जन्मे। 1930 में छपा 'नौवाँ शल्य वार्ड' (Dokuzuncu Hariciye Koğuşu) रुग्ण बचपन की पीड़ा को कथा में बदलने वाला मोड़ था। अगले ही बरस 'फ़ातिह-हरबिये' में उन्होंने पूरब और पश्चिम के तनाव को इस्तांबुल के दो मोहल्लों के बीच फँसी एक युवती की दुविधा में मूर्त कर दिया। कभी साथ छपने वाले नाज़िम हिकमत से हुई तीखी बहसों ने उन्हें विचारों के उस मोर्चे पर खड़ा किया जिसे वे अंत तक थामे रहे; 1953 में उन्होंने 'तुर्क दुशुंजेसी' पत्रिका निकाली। तैंतालीस बरस उन्होंने बिना रुके लिखा। तुर्की उपन्यास में मनोविश्लेषण, अंतर्मन का एकालाप और विचारों की बहस — तीनों को उन्होंने एक साथ उतारा, और 'मादमोइज़ेल नोरालिया की आरामकुर्सी' तथा 'हम अकेले हैं' में इसे और आगे ले गए। सैन्य सेवा के दौरान चल बसे बेटे मेर्वे की मृत्यु से वे कभी उबर न सके; 15 जून 1961 को इस्तांबुल में उनका देहांत हुआ और एदिरनेकापी में उन्हें दफ़नाया गया।
1940-1950 के दशक का इस्तांबुल, बौद्धिक, पतली टाई के साथ गहरे रंग का सूट पहने, तीखे नैन-नक्श, चश्मा लगाए हुए, थका हुआ किंतु गहरा और प्रखर भाव।