सबाहत्तिन अली का जन्म 25 फ़रवरी 1907 को गुमुल्जिने के पास एरिदेरे कस्बे में हुआ, जो तब उस्मानी ज़मीन था और आज बुल्गारिया का अर्दिनो है। पिता सेलाहत्तिन फ़ौजी अफ़सर थे, माँ का नाम हुस्निये था। बाल्कन हाथ से निकला तो परिवार अनातोलिया चला आया; लेखक का बचपन युद्धों, बार-बार के विस्थापन और तंगी की छाया में बीता। शिक्षक-प्रशिक्षण उन्होंने बालिकेसिर में शुरू किया और इस्तांबुल में 1926 में पूरा किया। योज़गात में एक साल पढ़ाने के बाद सरकारी छात्रवृत्ति पर वे जर्मनी गए और 1928 से 1930 तक पोट्सडाम में रहे। लौटकर उन्होंने आयदिन और कोन्या में जर्मन पढ़ाई। उनकी शुरुआती कविताएँ और कहानियाँ पत्रिकाओं में छपने लगी थीं कि 1932 में एक कविता के कारण वे गिरफ़्तार हुए; कोन्या और सिनोप की जेलों में सज़ा काटी और 1933 की आम माफ़ी से रिहा हुए। अंकारा में बस गए, शिक्षा मंत्रालय और राजकीय संगीत विद्यालय में काम किया और 1935 में विवाह किया। कहानी-संग्रह 'चक्की' के बाद उपन्यास आए: 'कुयुजाक का यूसुफ़' (1937), 'हमारे भीतर का शैतान' (1940) और 'फ़र कोट में मडोना' (1943)। 1946 में अज़ीज़ नेसिन और रिफ़त इल्गाज़ के साथ निकाला व्यंग्य अख़बार 'मार्कोपाशा' ख़ूब चर्चित हुआ; इसके बाद बंदिशें, मुक़दमे और फिर से जेल आई। अनातोलिया के छोटे कस्बों, बेबसों और सत्ता के रोज़मर्रा चेहरे को उन्होंने सादी और सख़्त भाषा में लिखा; वहीं 'फ़र कोट में मडोना' में उन्होंने भीतर की ओर मुड़ी, नाज़ुक आवाज़ आज़माई। पासपोर्ट न मिलने पर उन्होंने चुपचाप देश छोड़ने की कोशिश की और 1948 में बुल्गारिया की सरहद के पास, सीमा पार कराने वाले अली एर्तेकिन के हाथों मारे गए। शव महीनों बाद मिला; वे इकतालीस साल के थे। बरसों बाद 'फ़र कोट में मडोना' तुर्किये के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले उपन्यासों में गिना जाने लगा।
20वीं सदी का मध्य, तुर्की, सलीकेदार सूट और चश्मा पहने हुए, विचारमग्न भाव, उम्र लगभग 40 वर्ष।