यशर केमाल का जन्म 1923 में ओस्मानिये के पास हेमिते गाँव में हुआ और उनका नाम केमाल सादिक ग्योकचेली रखा गया। उनका कुर्द परिवार पहले विश्वयुद्ध के दिनों में वान इलाके से उजड़कर चुकुरोवा के मैदान में आ बसा था। लगभग तीन बरस की उम्र में एक दुर्घटना में उन्होंने दाहिनी आँख खो दी; पाँच के थे जब गाँव की मस्जिद में उनके पिता को छुरा मारकर मार डाला गया, और इस आघात से वे बारह साल की उम्र तक हकलाते रहे। पढ़ाई जल्दी छूट गई। वे कपास के खेतों में मज़दूरी करते रहे और कादिरली में अनपढ़ लोगों के लिए अर्ज़ियाँ लिखने लगे। किशोरावस्था में ही उन्होंने तोरोस पहाड़ों में शोकगीत जुटाने शुरू किए, और यह संग्रह 1943 में पुस्तक रूप में छपा। 1950 में साम्यवादी प्रचार के आरोप में गिरफ़्तार हुए; अगले बरस इस्तांबुल जाकर दैनिक 'जुम्हूरियेत' के लिए रिपोर्ताज लिखने लगे। अनातोलिया को गाँव-गाँव नापकर लिखे गए इन लेखों ने उन्हें बड़ा पाठक वर्ग दिया। पहला कहानी-संग्रह 1952 में आया और 1955 में 'इंजे मेमेद'। ज़मींदार के अत्याचार से बचकर पहाड़ चढ़ जाने वाले एक किसान की यह कथा लगभग चालीस भाषाओं में अनूदित हुई। इसके बाद के चुकुरोवा उपन्यासों में और मेमेद के अगले खंडों में उन्होंने वही मिट्टी और वही लोग एक फैलते हुए महाकाव्य की तरह लिखे। वे तुर्की मज़दूर पार्टी के नेतृत्व में रहे, अपने लिखे के कारण बार-बार मुक़दमों में घसीटे गए, और नब्बे के दशक में कुर्द प्रश्न पर लिखे एक लेख के लिए उन्हें निलंबित सज़ा मिली। उन्होंने मौखिक परंपरा के महाकाव्य, लोककथा और शोकगीत की भाषा को सामाजिक यथार्थवाद से जोड़ा; उनके यहाँ तोरोस और चुकुरोवा की प्रकृति मनुष्य की नियति से अलग नहीं होती। नोबेल के लिए उनका नाम प्रस्तावित हुआ और उन्हें चीनो देल दूका विश्व पुरस्कार तथा जर्मन पुस्तक व्यापार का शांति पुरस्कार मिला। 28 फ़रवरी 2015 को इस्तांबुल में उनका निधन हुआ।
20वीं सदी के मध्य का तुर्की, देहाती बुद्धिजीवी की पोशाक, तीखे चेहरे के नक़्श, घनी और जानी-पहचानी भौंहों वाला बुज़ुर्ग चेहरा।