लेखक · 2 रचनाएँ
चार्ल्स डिकेंस का जन्म 7 फ़रवरी 1812 को पोर्ट्समथ में हुआ। उनके पिता जॉन डिकेंस शाही नौसेना के वेतन कार्यालय में क्लर्क थे, और माँ एलिज़ाबेथ की आठ संतानों में वे दूसरे थे। घर हमेशा कर्ज़ में डूबा रहता था; 1824 में जब पिता को मार्शल्सी के कर्ज़दार कारागार में डाल दिया गया, तो बारह बरस के चार्ल्स को स्कूल से हटाकर एक जूता-पॉलिश गोदाम में भेज दिया गया, जहाँ वे छह शिलिंग हफ़्ते पर बोतलों पर लेबल चिपकाते थे। वे चंद महीने ऐसा घाव बनकर रह गए जिसकी चर्चा से वे जीवन भर बचते रहे।
पिता के छूटने पर वे स्कूल लौटे, फिर वकील के दफ़्तर में मुंशी का काम किया, आशुलिपि सीखी और संसद के रिपोर्टर बन गए। 1833 से पत्रिकाओं को भेजे गए उनके शहरी रेखाचित्र 1836 में बोज़ के रेखाचित्र नाम से पुस्तक रूप में आए। उसी वर्ष धारावाहिक रूप में शुरू हुए द पिकविक पेपर्स ने पच्चीस की उम्र में उन्हें देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला लेखक बना दिया; पहली किस्त छपने के दो दिन बाद उन्होंने कैथरीन होगार्थ से विवाह किया।
1837 से 1839 के बीच उन्होंने अपनी संपादित पत्रिका में ऑलिवर ट्विस्ट को किस्तों में छापा और उपन्यास को सामाजिक आलोचना का औज़ार बना दिया। डेविड कॉपरफ़ील्ड में वे अपने ही बचपन की ओर लौटे; अपनी निकाली पत्रिकाओं के ज़रिये वे उपन्यासकार के साथ-साथ एक सार्वजनिक व्यक्ति भी बने। 1858 में कैथरीन से अलग हो गए; युवा अभिनेत्री एलेन टर्नन से उनका संबंध अंत तक बना रहा। दो शहरों की कहानी 1859 में उनकी नई पत्रिका ऑल द ईयर राउंड की पहली धारावाहिक कृति के रूप में छपी।
किस्तवार छपाई ने उनकी शैली गढ़ी: हर अंक वे सबसे तनी हुई जगह पर रोकते, हँसी और करुणा को साथ-साथ रखते, और ऐसे पात्र गढ़े जिनका नाम लेते ही चेहरा सामने आ जाता है। उन्होंने गली की अंग्रेज़ी को उपन्यास में उतारा और गरीबी तथा संस्थाओं की बेरुख़ी को पाठक के सामने रख दिया। अंतिम उपन्यास एडविन ड्रूड का रहस्य अधूरा ही रह गया; 9 जून 1870 को केंट स्थित अपने घर गैड्स हिल प्लेस में आघात से उनका निधन हुआ और वेस्टमिंस्टर ऐबी के कवि कोने में उन्हें दफ़नाया गया।
डिकेंस ने विक्टोरियाई इंग्लैंड के उन शहरों में लिखा जो उद्योग के साथ फूल रहे थे और उसी रफ़्तार से गरीब हो रहे थे। 1834 के दरिद्र कानून से बने कर्मागार, बाल श्रम और कर्ज़ के लिए कैद उस समय की सबसे तीखी बहसें थीं; उपन्यास को इन बहसों के भीतर खींच लाने वाला यथार्थवाद ज़ोर पकड़ रहा था। सस्ती किस्तवार छपाई ने वर्ग की सीमाएँ लाँघकर पाठकों को बढ़ाया और लेखक को व्यापक जनमत का प्रवक्ता बना दिया। फ्रांसीसी क्रांति की स्मृति सुधार या विद्रोह के सवाल को जीवित रखे हुए थी।