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अलेक्सांद्र द्यूमा का जन्म 24 जुलाई 1802 को विलेर-कोतरे नामक कस्बे में हुआ। उनके पिता थॉमस-अलेक्सांद्र द्यूमा एक फ़्रांसीसी कुलीन और सेंट-डोमिंग की एक दासी स्त्री की संतान थे; वे क्रांति की सेनाओं में जनरल के पद तक पहुँचे, नेपोलियन से उनकी ठन गई और 1806 में, बेटे के चार वर्ष का होने से पहले ही उनका देहांत हो गया। विधवा को पेंशन नहीं मिली और परिवार निर्धन हो गया। नियमित पढ़ाई से वंचित उस बालक की एकमात्र पूँजी थी उसकी सुंदर लिखावट; चौदह की उम्र में वह कस्बे के नोटरी का मुंशी बन गया।
1823 में वे पेरिस पहुँचे, जहाँ उसी लिखावट ने उन्हें ऑर्लेआं के ड्यूक—भावी राजा लुई-फिलिप—के दफ़्तर में जगह दिलाई। शामें रंगमंच में बीततीं, रातें शेक्सपियर और शिलर के साथ। फ़रवरी 1829 में कॉमेडी-फ्रांसेज़ में खेला गया हेनरी तृतीय और उसका दरबार शास्त्रीय नियमों को किनारे रखकर हंगामा खड़ा कर गया; ह्यूगो के एर्नानी से एक वर्ष पहले इसे स्वच्छंदतावादी नाटक की पहली जीत माना गया। दो साल बाद एंटनी ने उनका नाम पक्का कर दिया।
अपनी असली धारा उन्होंने 1840 के दशक में पाई, जब अख़बारों ने धारावाहिक उपन्यास के लिए पन्ने खोले। ऑगस्ट माके के साथ मिलकर उन्होंने 1844 में तीन बंदूकधारी को ल सिएकल में और मोंटे क्रिस्टो का काउंट को जर्नल दे देबा में क्रमशः छपवाया। जितनी तेज़ी से कमाया, उतनी ही तेज़ी से ख़र्च किया: अपना थिएटर खड़ा किया, पोर्ट-मार्ली में मोंटे क्रिस्टो का महल बनवाया। 1850 में थिएटर दिवालिया हुआ तो वे लेनदारों से बचकर ब्रुसेल्स भाग गए। बाद में रूस घूमे, इटली में गैरीबाल्डी से जा मिले और चार वर्ष नेपल्स में रहे।
इतिहास उनके यहाँ अभिलेखागार नहीं, रंगमंच है: कथा संवाद के बल पर चलती है और हर किस्त ठीक वहीं टूटती है जहाँ जिज्ञासा सबसे कसती है। उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास को पाठकों के संकरे घेरे से निकालकर व्यापक जनता को सौंपा और साहसिक कथा के वे साँचे गढ़े जो आज भी काम आते हैं। 5 दिसंबर 1870 को, प्रशिया से युद्ध के बीच, डिएप के पास प्वी में अपने बेटे के घर वे लगभग कंगाल हालत में चल बसे। 2002 में उनके अवशेष पैंथियन ले जाए गए।
द्यूमा ने उस दौर में लिखा जब फ़्रांस राजतंत्र, क्रांति और साम्राज्य के बीच डोल रहा था। वे शास्त्रीय नियमबद्धता के विरुद्ध उठी स्वच्छंदतावादी पीढ़ी के थे, और इतिहास को वह दर्पण माना जाता था जिसमें कोई राष्ट्र स्वयं को पहचानता है। अख़बारों के सस्ते होने और धारावाहिक प्रकाशन ने उपन्यास को पहली बार विशाल जनता तक पहुँचाया, और तभी यह बहस उठी कि यह साहित्य है या औद्योगिक माल—यही आरोप जीवन भर द्यूमा का पीछा करता रहा।