लेखक · 2 रचनाएँ
चिंगिज़ ऐतमातोव का जन्म 12 दिसंबर 1928 को किर्गिज़स्तान की तलास घाटी के शेकर गाँव में हुआ। उनके पिता तोरेकुल ऐतमातोव पहले किर्गिज़ कम्युनिस्टों में से एक और पार्टी के अधिकारी थे; माँ नगीमा तातार मूल की थीं। बचपन का कुछ हिस्सा मास्को में बीता, जहाँ पिता पढ़ाई कर रहे थे। 1937 में पिता को ‘जनता का दुश्मन’ बताकर गिरफ़्तार किया गया और 1938 में गोली मार दी गई। परिवार गाँव लौट आया; युद्ध के वर्षों में मुश्किल से चौदह बरस के इस लड़के ने गाँव की सोवियत में मुंशी का काम किया।
1946 में उन्होंने पशु-चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की, 1953 में फ्रुंज़े के कृषि संस्थान से स्नातक हुए और कुछ समय पशुपालन विशेषज्ञ के रूप में काम किया। उनकी पहली कहानियाँ 1952 में छपीं। 1956 से 1958 तक वे मास्को के मैक्सिम गोर्की साहित्य संस्थान में पढ़े; उन्हीं वर्षों से निकली ‘जमीला’ ने एक ही झटके में उनका नाम बना दिया। 1959 से वे ‘प्रावदा’ के किर्गिज़स्तान संवाददाता रहे।
1963 में पहाड़ों और मैदानों की कहानियों को समेटने वाली किताब ने उन्हें लेनिन पुरस्कार दिलाया; उसी बरस ‘धरती माता’ छपी। ‘सफ़ेद जहाज़’ (1970) में किंवदंती और यथार्थ को एक-दूसरे में बुनने वाली उनकी कथा-शैली पक गई। ‘एक दिन जो सदी से लंबा था’ (1980) में उन्होंने मानकुर्त की किंवदंती को — उस दास की, जिसकी स्मृति मिटा दी गई थी — अपने समय के भुलक्कड़पन से जोड़ दिया। अस्सी के दशक के अंत में वे गोर्बाचेव के सलाहकारों में शामिल हुए और बाद में लक्ज़मबर्ग तथा ब्रसेल्स में राजदूत रहे।
उन्होंने किर्गिज़ और रूसी, दोनों में लिखा और अक्सर अपने ही पाठों का अनुवाद किया। मौखिक परंपरा की किंवदंतियाँ, विलाप-गीत और पशु-कथाएँ वे आधुनिक उपन्यास के भीतर ले आए और मैदान की एक साधारण ज़िंदगी को विवेक के सार्वभौम प्रश्न में बदल दिया। 10 जून 2008 को नूरेमबर्ग में उनका देहांत हुआ। उन्हें अता-बेयित कब्रिस्तान में दफ़नाया गया, जिसे बसाने में उनका हाथ था और जहाँ उनके पिता के अवशेष भी हैं।
ऐतमातोव ने स्तालिन के बाद के ‘पिघलाव’ के वर्षों में लिखना शुरू किया, जब सेंसरशिप ढीली पड़ी और निर्वासनों तथा सफ़ाइयों पर पहली बार बात हो सकी। समाजवादी यथार्थवाद के साँचों में किर्गिज़ मौखिक परंपरा, किंवदंती और मिथक घुसा देने के लिए उनकी प्रशंसा भी हुई और आलोचना भी। सोवियत भट्ठी में राष्ट्रीय संस्कृतियों के घुल जाने की बहस, प्रकृति और स्मृति के लोप की चिंता, और फिर ग्लासनोस्त से खुला हिसाब-किताब का मैदान — यही तनाव उनकी किताबों को घेरे रहे। रूसी में लिखने वाले किर्गिज़ होने के नाते वे एक साथ दो साहित्यों के थे।