लेखक · 3 रचनाएँ
लेव निकोलायेविच तोल्स्तोय का जन्म 1828 में तूला के पास पारिवारिक जागीर यास्नाया पोल्याना में, एक पुराने कुलीन घराने में हुआ। दो वर्ष के होने से पहले माँ और नौ वर्ष की उम्र में पिता को खोने के बाद वे रिश्तेदारों के बीच पले। कज़ान विश्वविद्यालय में उन्होंने पहले पूर्वी भाषाएँ और फिर विधि पढ़ी, पर उपाधि लिए बिना ही चले आए और पैतृक भूमि पर लौट गए। यास्नाया पोल्याना जीवन भर वह जगह बनी रही जहाँ वे बार-बार लौटते रहे।
1851 में वे तोपखाने की एक टुकड़ी में भर्ती होकर काकेशस गए; सैनिक वर्षों ने उन्हें लिखने के निकट पहुँचाया। पहली किताब 'बचपन' 1852 में पत्रिका 'सोव्रेमेन्निक' में छपी और उनका नाम बना; उसके बाद 'किशोरावस्था' और 'युवावस्था' आईं। क्रीमिया युद्ध के दौरान वे सेवास्तोपोल की घेराबंदी में रहे, और वहीं से निकली 'सेवास्तोपोल की कहानियाँ' ने युद्ध को वीरता के आभूषण से रहित देखने की दृष्टि के कारण ध्यान खींचा।
1859 में उन्होंने अपनी जागीर पर किसानों के बच्चों के लिए एक पाठशाला खोली। 1862 में सोफ़िया आन्द्रेयेव्ना बेर्स से विवाह किया; उनके तेरह बच्चे हुए। 'युद्ध और शांति' और उसके बाद 'अन्ना कारेनिना' इन्हीं वर्षों में लिखी गईं। 'अन्ना कारेनिना' के बाद आए आस्था के संकट को उन्होंने 'एक स्वीकारोक्ति' में लिखा और संपत्ति, चर्च तथा राज्य की हिंसा को अस्वीकार करने वाले सिद्धांत की ओर मुड़े। 1901 में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया।
पिछले दौर की कथाओं 'इवान इलिच की मृत्यु' और 'हाजी मुराद' में उनका वह ढंग सघनतम रूप में आया, जिसमें ब्योरे जुड़ते जाते हैं और एक व्यक्ति का भीतरी संसार खुल जाता है। पात्रों की चेतना में रिसता उनका कथन इस बात का माप बदल गया कि उपन्यास क्या कर सकता है; हिंसा के बिना प्रतिरोध का उनका विचार रूस के बाहर भी गूँजा और गांधी तक पहुँचा। 1910 की शरद ऋतु में वे चुपचाप घर से निकल गए, रास्ते में बीमार पड़े और अस्तापोवो स्टेशन पर उनकी मृत्यु हुई। 'हाजी मुराद' उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई।
तोल्स्तोय ने उन दशकों में लिखा जब यथार्थवाद रूसी साहित्य को गढ़ रहा था। 1861 में भूदास प्रथा के उन्मूलन ने इस बहस को और तीखा किया कि रूस पश्चिम के पीछे चले या अपना रास्ता ले; 'सोव्रेमेन्निक' जैसी पत्रिकाओं में उग्र विचारों वाले बुद्धिजीवी और कुलीन घरानों के लेखक एक ही पन्ने साझा करते थे। उपन्यास वह मैदान बन गया जहाँ सामाजिक प्रश्न परखे जाते थे। अपने अंतिम तीस वर्षों में तोल्स्तोय चर्च और राज्य के अधिकार को नकारने वाली नैतिक शिक्षा के साथ इसी बहस के केंद्र में खड़े रहे।