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नामिक केमल का जन्म 21 दिसंबर 1840 को तेकिरदाग़ में हुआ। उनके पिता मुस्तफ़ा आसिम बे आगे चलकर दरबार के प्रमुख ज्योतिषी बने; माँ फ़ातमा ज़ेहरा हानिम का देहांत तब हुआ जब वे आठ बरस के थे। बचपन नाना अब्दुल्लतीफ़ पाशा की तैनातियों के पीछे-पीछे बीता, कार्स से सोफ़िया तक। नियमित स्कूल कभी नसीब नहीं हुआ; अरबी, फ़ारसी और दीवान कविता उन्होंने निजी उस्तादों से सीखी। "नामिक" उपनाम उन्हें सोफ़िया में एक कवि ने दिया, जिसे उनकी नज़्में भा गई थीं।
जवानी में वे इस्तांबुल आ बसे और अनुवाद कार्यालय में दाख़िल हुए; वहाँ निखारी गई फ़्रांसीसी ने उनके लिए यूरोप का दरवाज़ा खोला। असली मोड़ 1860 के दशक के आरंभ में आया, जब शिनासी से मुलाक़ात हुई। दीवान कविता के साँचे छोड़कर वे पत्रकारिता की ओर मुड़े; शिनासी के पेरिस चले जाने पर उन्होंने "तस्वीर-ए-एफ़कार" का संपादन संभाला और वे लेख लिखे जिन्होंने आज़ादी, वतन और क़ौम जैसे शब्दों को तुर्की में जड़ें दीं।
यंग ओटोमन्स से जुड़ते ही दबाव बढ़ा: 1867 में वे पेरिस भाग निकले, फिर लंदन में ज़िया पाशा के साथ "हुर्रियत" अख़बार निकाला। 1870 में लौटकर "इब्रत" शुरू किया। 1873 में "मातृभूमि या सिलिस्त्रा" मंचित हुआ और दर्शकों का जोश सड़कों पर उतर आया, तो बिना मुक़दमे उन्हें फ़ामागुस्ता भेज दिया गया। क़िले के अड़तीस महीने सबसे उपजाऊ रहे: "बेचारा बच्चा", "आकिफ़ बे", "जलालुद्दीन ख़्वारज़्मशाह" और "जागरण" वहीं लिखे गए।
कला को उन्होंने समाज को जगाने का साधन माना; दीवान की अलंकृत गद्य-शैली छोड़कर ऐसी ज़बान खोजी जिसके साथ पाठक चल सके। "जागरण" तुर्की उपन्यास की शुरुआत मानी जाती है और उनके नाटक पश्चिमी ढंग के रंगमंच की। 1876 के बाद उन्होंने लेस्बोस, रोड्स और खियोस का शासन संभाला। 2 दिसंबर 1888 को खियोस में उनका देहांत हुआ; वसीयत के अनुसार उन्हें बोलायिर में सुलेमान पाशा के मक़बरे के पास दफ़नाया गया।
उन्होंने तंज़ीमात की दूसरी पीढ़ी के साथ लिखा — उन बरसों में जब क़र्ज़ और ज़मीन के नुक़सान से साम्राज्य हिल रहा था और निरंकुश शासन के विरुद्ध संविधान की माँग उठ रही थी। नामिक केमल उस आंदोलन के बीचोंबीच थे: जो साहित्य को राजनीति का औज़ार बनाता था, अख़बार को नई विधा की तरह अपनाता था, और फ़्रांसीसी उपन्यास तथा नाटक को उस्मानी लेखन में उतारता था। दीवान की सजावट के सामने सादी ज़बान, दरबारी अदब के सामने जनता के लिए कला — यह बहस ठीक तभी तीखी हुई।