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विक्टर ह्यूगो का जन्म 26 फ़रवरी 1802 को बेज़ांसों में हुआ। उनके पिता लियोपोल्ड ह्यूगो नेपोलियन की सेना में अफ़सर थे और माँ सोफ़ी त्रेब्यूशे पक्की राजतंत्रवादी — एक ही छत के नीचे दो विरोधी दुनियाएँ रहती थीं। पिता की तैनातियों के कारण परिवार लगातार सफ़र में रहा और बचपन इटली और स्पेन तक पहुँचा। आख़िरकार वे माँ के साथ पेरिस में बस गए, जहाँ पढ़ना बहुत जल्दी उनकी शरणगाह बन गया।
बीस की उम्र में उन्होंने पहला कविता-संग्रह छपवाया और उसी वर्ष बचपन की सहेली अदेल फ़ूशे से विवाह किया। 1827 में 'क्रॉमवेल' की भूमिका में उन्होंने शास्त्रीय रंगमंच के नियमों को खुली चुनौती दी और उसे युवा स्वच्छंदतावादियों का घोषणापत्र माना गया। 1830 में 'एरनानी' के पहले मंचन ने सभागार को झगड़े में बदल दिया; 'एरनानी की लड़ाई' कही जाने वाली उस रात ने उन्हें नई पीढ़ी के सबसे आगे ला खड़ा किया। एक साल बाद 'नोत्र दाम का कुबड़ा' छपा।
1841 में वे फ़्रांसीसी अकादमी के लिए चुने गए, पर असली दरार 1843 में आई: विवाह के थोड़े ही समय बाद उनकी बेटी लियोपोल्दीन सीन नदी में नाव पलटने से डूब गई। ह्यूगो को यह ख़बर अख़बार से मिली और वे वर्षों तक अपनी कविताओं में उसका निशान खोजते रहे। 1851 में लुई नेपोलियन के तख़्तापलट का विरोध करने पर उन्हें फ़्रांस छोड़ना पड़ा; ब्रसेल्स के बाद जर्सी और फिर ग्वेर्नसी द्वीप पर लंबा निर्वासन शुरू हुआ। 'ले मिज़राब्ल' का बड़ा हिस्सा उन्होंने वहीं लिखा और 'समुद्र के मज़दूर' उसी द्वीप को समर्पित किया।
उनकी भाषा लंबी साँस वाली और ऊँची आवाज़ की थी: उन्होंने गली की बोली को कविता में और इतिहास तथा ग़रीबी को उपन्यास में उतारा, और जीवन भर मृत्युदंड के ख़िलाफ़ लिखा। 1870 में वे फ़्रांस लौटे और 1876 में सीनेटर चुने गए। 22 मई 1885 को पेरिस में उनका निधन हुआ; राजकीय अंत्येष्टि के साथ उन्हें विदा किया गया और पैंथियन में दफ़नाया गया।
ह्यूगो ने उन वर्षों में लिखा जब फ़्रांस एक ही सदी में साम्राज्य, राजतंत्र और गणतंत्र के बीच डोलता रहा। जिस माहौल में शास्त्रीय नियम ही एकमात्र कसौटी माने जाते थे, वहाँ उन्होंने स्वच्छंदतावाद की अगुवाई की और बँधे-बँधाए साँचों की जगह इतिहास, जनभाषा और साधारण आदमी को रखा। औद्योगिक होते शहरों की ग़रीबी तथा न्याय और मृत्युदंड की बहसें सीधे उनके लेखन में आ गईं। वे कभी नहीं मानते थे कि साहित्य को राजनीति से अलग रखा जा सकता है; लगभग बीस साल का निर्वासन इसी विश्वास की क़ीमत थी।